भगवद्गीता
अध्याय 12, श्लोक 13-14
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
adveṣṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva ca nirmamo nirahaṅkāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣamī santuṣṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛḍha-niścayaḥ mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ
अर्थ
जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और करुणामय है, ममता व अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समान रहता है, क्षमाशील है, सदैव संतुष्ट रहने वाला योगी है, आत्मसंयमी और दृढ़निश्चयी है, तथा जिसने अपना मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दिया है — ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।
सरल व्याख्या और जीवन में प्रयोग
इस श्लोक को केवल एक सुंदर वाक्य के रूप में पढ़ने के बजाय उसके प्रसंग को समझना उपयोगी है। कुरुक्षेत्र के संवाद में अर्जुन का प्रश्न भय, कर्तव्य, संबंध और निर्णय से जुड़ा है। इसलिए यह शिक्षा आज भी तब सहारा दे सकती है जब मन असमंजस में हो। पहले श्लोक का उच्चारण धीरे-धीरे करें, फिर अपने शब्दों में उसका भाव लिखें और सोचें कि परिवार, काम या साधना की किसी वास्तविक परिस्थिति में यह विचार आपको अधिक धैर्य, विवेक या करुणा कैसे दे सकता है।
भगवद्गीता का अध्ययन एक दिन में समाप्त होने वाला पाठ नहीं है। एक श्लोक को कुछ दिनों तक पढ़ना, उसके अर्थ पर मनन करना और अपने व्यवहार में छोटे परिवर्तन देखना अधिक उपयोगी है। अध्याय का व्यापक संदर्भ देखने के लिए हिंदी गीता संग्रह पर लौटें और विस्तृत अंग्रेज़ी व्याख्या भी पढ़ें।