भगवद्गीता
अध्याय 13, श्लोक 13
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते | अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते
jñeyaṃ yattatpravakṣyāmi yajjñātvāmṛtamaśnute . anādi matparaṃ brahma na sattannāsaducyate
अर्थ
।।13.13।। मैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।
सरल व्याख्या और जीवन में प्रयोग
इस श्लोक को केवल एक सुंदर वाक्य के रूप में पढ़ने के बजाय उसके प्रसंग को समझना उपयोगी है। कुरुक्षेत्र के संवाद में अर्जुन का प्रश्न भय, कर्तव्य, संबंध और निर्णय से जुड़ा है। इसलिए यह शिक्षा आज भी तब सहारा दे सकती है जब मन असमंजस में हो। पहले श्लोक का उच्चारण धीरे-धीरे करें, फिर अपने शब्दों में उसका भाव लिखें और सोचें कि परिवार, काम या साधना की किसी वास्तविक परिस्थिति में यह विचार आपको अधिक धैर्य, विवेक या करुणा कैसे दे सकता है।
भगवद्गीता का अध्ययन एक दिन में समाप्त होने वाला पाठ नहीं है। एक श्लोक को कुछ दिनों तक पढ़ना, उसके अर्थ पर मनन करना और अपने व्यवहार में छोटे परिवर्तन देखना अधिक उपयोगी है। अध्याय का व्यापक संदर्भ देखने के लिए हिंदी गीता संग्रह पर लौटें और विस्तृत अंग्रेज़ी व्याख्या भी पढ़ें।