भगवद्गीता
अध्याय 18, श्लोक 58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि | अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi . atha cettvamahaṃkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi
अर्थ
।।18.58।। मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे।।
सरल व्याख्या और जीवन में प्रयोग
इस श्लोक को केवल एक सुंदर वाक्य के रूप में पढ़ने के बजाय उसके प्रसंग को समझना उपयोगी है। कुरुक्षेत्र के संवाद में अर्जुन का प्रश्न भय, कर्तव्य, संबंध और निर्णय से जुड़ा है। इसलिए यह शिक्षा आज भी तब सहारा दे सकती है जब मन असमंजस में हो। पहले श्लोक का उच्चारण धीरे-धीरे करें, फिर अपने शब्दों में उसका भाव लिखें और सोचें कि परिवार, काम या साधना की किसी वास्तविक परिस्थिति में यह विचार आपको अधिक धैर्य, विवेक या करुणा कैसे दे सकता है।
भगवद्गीता का अध्ययन एक दिन में समाप्त होने वाला पाठ नहीं है। एक श्लोक को कुछ दिनों तक पढ़ना, उसके अर्थ पर मनन करना और अपने व्यवहार में छोटे परिवर्तन देखना अधिक उपयोगी है। अध्याय का व्यापक संदर्भ देखने के लिए हिंदी गीता संग्रह पर लौटें और विस्तृत अंग्रेज़ी व्याख्या भी पढ़ें।