आयुर्वेद · Classical Text
The Purpose of Ayurveda (आयुर्वेद का प्रयोजन)
प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् आतुरस्य विकारप्रशमनं च।
prayojanaṁ cāsya svasthasya svāsthya-rakṣaṇam āturasya vikāra-praśamanaṁ ca
— Charaka Samhita, Sutrasthana (commonly cited around 30.26 — exact numbering can vary slightly by edition)
परिचय
यह चरक संहिता के प्रारंभिक अध्याय (सूत्रस्थान) से आयुर्वेदिक साहित्य की सबसे अधिक उद्धृत पंक्तियों में से एक है, जिसे सामान्यतः श्लोक 30.26 के आसपास बताया जाता है। यह संपूर्ण पद्धति के उद्देश्य को एक ही वाक्य में व्यक्त करता है, और अक्सर आयुर्वेद के विद्यार्थियों को सबसे पहले पढ़ाया जाता है क्योंकि यह आगे आने वाली हर बात को परिभाषित करता है: आयुर्वेद के दो लक्ष्य बताए गए हैं, एक नहीं — स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना, और रोगी व्यक्ति के विकार को शांत करना। यह परिभाषा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रोकथाम को उपचार के समान महत्व देती है, न कि गौण मानती है। यही शास्त्रीय आधार है कि दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-संबंधी मार्गदर्शन जैसी आयुर्वेद की इतनी सामग्री उन लोगों के लिए है जो बिल्कुल बीमार नहीं हैं — और यही एक कारण है कि आयुर्वेद को अक्सर उतनी ही दैनिक जीवनशैली की पद्धति माना जाता है जितना चिकित्सा पद्धति।
लाभ
इसके पारंपरिक लाभों का विस्तृत विवरण अंग्रेज़ी पृष्ठ पर उपलब्ध है।
संस्कृत पाठ, विस्तृत उपयोग विधि और अंग्रेज़ी व्याख्या के लिए अंग्रेज़ी पृष्ठ पढ़ें। अन्य विषयों के लिए हिंदी आयुर्वेद संग्रह पर जाएँ।