भगवद्गीता

अध्याय 12, श्लोक 18

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः | शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः

samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ . śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ

अर्थ

।।12.18।। जो शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में सम है, जो शीत-उष्ण और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों में सम है और आसक्ति से रहित है,

सरल व्याख्या और जीवन में प्रयोग

इस श्लोक को केवल एक सुंदर वाक्य के रूप में पढ़ने के बजाय उसके प्रसंग को समझना उपयोगी है। कुरुक्षेत्र के संवाद में अर्जुन का प्रश्न भय, कर्तव्य, संबंध और निर्णय से जुड़ा है। इसलिए यह शिक्षा आज भी तब सहारा दे सकती है जब मन असमंजस में हो। पहले श्लोक का उच्चारण धीरे-धीरे करें, फिर अपने शब्दों में उसका भाव लिखें और सोचें कि परिवार, काम या साधना की किसी वास्तविक परिस्थिति में यह विचार आपको अधिक धैर्य, विवेक या करुणा कैसे दे सकता है।

भगवद्गीता का अध्ययन एक दिन में समाप्त होने वाला पाठ नहीं है। एक श्लोक को कुछ दिनों तक पढ़ना, उसके अर्थ पर मनन करना और अपने व्यवहार में छोटे परिवर्तन देखना अधिक उपयोगी है। अध्याय का व्यापक संदर्भ देखने के लिए हिंदी गीता संग्रह पर लौटें और विस्तृत अंग्रेज़ी व्याख्या भी पढ़ें।

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