भगवद्गीता

अध्याय 12, श्लोक 3

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते | सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलन्ध्रुवम्

ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate . sarvatragamacintyañca kūṭasthamacalandhruvam

अर्थ

।।12.3।। परन्तु जो पुरुष अक्षर, अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव (नित्य) ब्रह्म की भली-भाँति उपासना करते हैं,

सरल व्याख्या और जीवन में प्रयोग

इस श्लोक को केवल एक सुंदर वाक्य के रूप में पढ़ने के बजाय उसके प्रसंग को समझना उपयोगी है। कुरुक्षेत्र के संवाद में अर्जुन का प्रश्न भय, कर्तव्य, संबंध और निर्णय से जुड़ा है। इसलिए यह शिक्षा आज भी तब सहारा दे सकती है जब मन असमंजस में हो। पहले श्लोक का उच्चारण धीरे-धीरे करें, फिर अपने शब्दों में उसका भाव लिखें और सोचें कि परिवार, काम या साधना की किसी वास्तविक परिस्थिति में यह विचार आपको अधिक धैर्य, विवेक या करुणा कैसे दे सकता है।

भगवद्गीता का अध्ययन एक दिन में समाप्त होने वाला पाठ नहीं है। एक श्लोक को कुछ दिनों तक पढ़ना, उसके अर्थ पर मनन करना और अपने व्यवहार में छोटे परिवर्तन देखना अधिक उपयोगी है। अध्याय का व्यापक संदर्भ देखने के लिए हिंदी गीता संग्रह पर लौटें और विस्तृत अंग्रेज़ी व्याख्या भी पढ़ें।

Read the full explanation in English →