त्योहार · शनिवार, 21 नवंबर 2026
तुलसी विवाह 2026 कब है? तिथि, पूजा विधि, सामग्री और कथा
अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
तुलसी विवाह 2026 शनिवार, 21 नवंबर को कार्तिक शुक्ल द्वादशी के दिन है। नई दिल्ली में द्वादशी तिथि 21 नवंबर सुबह लगभग 6:31 बजे से 22 नवंबर सुबह 4:56 बजे तक है और विवाह शाम गोधूलि वेला में किया जाता है। कई परिवार देव उठनी एकादशी की शाम, 20 नवंबर को ही तुलसी विवाह करते हैं। इस दिन तुलसी के पौधे का विवाह शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से कराया जाता है।
तुलसी विवाह 2026: तिथि और मुहूर्त
| तुलसी विवाह | शनिवार, 21 नवंबर 2026 |
|---|---|
| द्वादशी तिथि | 21 नवंबर सुबह लगभग 6:31 बजे से 22 नवंबर सुबह 4:56 बजे तक |
| विवाह का समय | शाम, गोधूलि वेला — स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें |
| देव उठनी एकादशी | शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 |
| कार्तिक पूर्णिमा | मंगलवार, 24 नवंबर 2026 |
समय नई दिल्ली के अनुसार अनुमानित हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त और तिथि शहर के अनुसार बदलती है, इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
तुलसी विवाह कार्तिक मास का एक बहुत प्यारा पर्व है, जिसमें घर-घर में तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाकर उसका विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से कराया जाता है। यह देव उठनी एकादशी के अगले दिन आता है और इसके साथ ही चातुर्मास समाप्त होकर विवाह का शुभ मौसम शुरू हो जाता है।
तुलसी विवाह की सामग्री
- तुलसी का गमला, शालिग्राम या विष्णु/श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र
- मंडप के लिए चार गन्ने, केले के पत्ते, आम के पत्ते, तोरण
- तुलसी के लिए लाल चुनरी और सुहाग सामग्री: चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, बिछिया, कंघी, शीशा
- शालिग्राम के लिए पीला वस्त्र, जनेऊ, चंदन
- हल्दी, कुमकुम, अक्षत, कलावा (गठबंधन के लिए), फूल, फूलमाला
- घी का दीपक, धूप, कपूर, कलश, नारियल
- मौसमी फल: सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, आँवला, सीताफल, गन्ना
- मिठाई, पंचामृत, तुलसी दल
घर पर तुलसी विवाह की विधि
- तैयारी: दिन में तुलसी के गमले को साफ़ करें, गेरू या रंगोली से सजाएँ और आँगन में चौक पूरें।
- मंडप: शाम को चार गन्नों को तुलसी के चारों ओर खड़ा करके ऊपर से बाँधें और फूलों-पत्तों से मंडप सजाएँ।
- कलश और गणेश पूजन: पास में कलश स्थापित करें और पहले गणेश जी की पूजा करें।
- तुलसी का शृंगार: तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाएँ और सुहाग की सारी सामग्री अर्पित करें।
- वर पक्ष: शालिग्राम या विष्णु जी की प्रतिमा को चौकी पर तुलसी के दाहिनी ओर रखें, पंचामृत से स्नान कराएँ और पीला वस्त्र, जनेऊ, चंदन अर्पित करें।
- विवाह संस्कार: दोनों को हल्दी, कुमकुम, अक्षत और फूल चढ़ाएँ। कलावे से तुलसी और शालिग्राम का गठबंधन करें। घर की कोई महिला या दंपति कन्यादान का संकल्प लेकर तुलसी का “दान” करें।
- फेरे: शालिग्राम को हाथ में लेकर तुलसी की सात परिक्रमा करें। साथ में मंगल गीत गाए जाते हैं।
- आरती और प्रसाद: ॐ जय जगदीश हरे आरती करें, मौसमी फलों और मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद बाँटें।
तुलसी विवाह की कथा
प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक शक्तिशाली असुर था। उसकी पत्नी वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त और महान पतिव्रता थीं। वृंदा के पतिव्रत धर्म की शक्ति इतनी प्रबल थी कि जालंधर युद्ध में अजेय हो गया था। इस बल के घमंड में उसने देवताओं को सताना शुरू कर दिया और अंत में भगवान शिव से युद्ध छेड़ दिया।
देवता चिंतित होकर भगवान विष्णु के पास पहुँचे। जब तक वृंदा का पतिव्रत अखंड रहता, जालंधर को कोई नहीं हरा सकता था। तब भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धरा और वृंदा के महल में पहुँचे। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर उनका स्पर्श किया, और इससे उनका पतिव्रत भंग हो गया। उसी क्षण युद्ध में भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।
जब वृंदा को सच्चाई पता चली, तो उन्हें गहरा आघात लगा। उन्होंने भगवान विष्णु से कहा, “आपने छल से मेरा धर्म भंग किया है। आप पत्थर हो जाएँ।” भगवान ने यह शाप स्वीकार कर लिया और शालिग्राम शिला बन गए। यह देखकर देवताओं और माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की, तब वृंदा ने शाप वापस ले लिया, पर स्वयं अपने पति के साथ सती हो गईं।
जहाँ वृंदा की भस्म गिरी, वहाँ एक पौधा उग आया। भगवान विष्णु ने उसे तुलसी नाम दिया और वरदान दिया, “तुम मुझे लक्ष्मी के समान प्रिय रहोगी। तुलसी के बिना मेरी कोई पूजा पूर्ण नहीं होगी। मेरे शालिग्राम रूप के साथ हर वर्ष तुम्हारा विवाह होगा।” तभी से कार्तिक शुक्ल एकादशी या द्वादशी को तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराने की परंपरा चली आ रही है।
यह कथा भक्ति, त्याग और धर्म की गहराई को दिखाती है — वृंदा का समर्पण इतना पवित्र था कि भगवान ने उसे अपने सबसे प्रिय पौधे के रूप में सदा अपने पास रख लिया।
तुलसी विवाह के नियम
- तुलसी विवाह के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए पहले से तोड़कर रखें।
- विवाह शाम के समय, गोधूलि वेला में करें।
- कन्यादान करने वाले दंपति उस दिन व्रत रखते हैं और विवाह के बाद भोजन करते हैं।
- विवाह के बाद तुलसी पर चढ़ी सुहाग सामग्री किसी सुहागिन स्त्री को दान कर दें।
तुलसी के औषधीय गुणों के बारे में तुलसी के फायदे पढ़ें। इसके तीन दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली (24 नवंबर) है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तुलसी विवाह 2026 में कब है?
अधिकतर भारतीय पंचांगों के अनुसार तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल द्वादशी) को है। नई दिल्ली में द्वादशी तिथि 21 नवंबर सुबह लगभग 6:31 बजे से 22 नवंबर सुबह 4:56 बजे तक है। कुछ परिवार एकादशी की शाम, 20 नवंबर को विवाह करते हैं।
तुलसी विवाह किससे होता है?
तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से किया जाता है। जिनके घर शालिग्राम न हो, वे भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र से विवाह कराते हैं। कुछ क्षेत्रों में गन्ने या आँवले की टहनी को भी वर रूप माना जाता है।
क्या तुलसी विवाह एकादशी से पूर्णिमा तक कभी भी कर सकते हैं?
हाँ, कई क्षेत्रों में तुलसी विवाह देव उठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा (2026 में 20 से 24 नवंबर) के बीच किसी भी दिन किया जाता है। सबसे प्रचलित दिन द्वादशी है। अपने परिवार या मंदिर की परंपरा का पालन करें।
तुलसी विवाह कराने से क्या फल मिलता है?
मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से कन्यादान के समान पुण्य मिलता है। जिन दंपतियों की बेटी नहीं है, वे विशेष रूप से तुलसी का कन्यादान करते हैं। इसे वैवाहिक जीवन में सुख और घर में समृद्धि देने वाला माना जाता है।
तुलसी विवाह के बाद ही शादियाँ क्यों शुरू होती हैं?
चातुर्मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में माने जाते हैं, इसलिए विवाह टाले जाते हैं। देव उठनी एकादशी को भगवान जागते हैं और तुलसी विवाह उनके जागने के बाद का पहला मंगल कार्य है। इसके बाद विवाह का मौसम शुरू होता है।
तुलसी विवाह में तुलसी को क्या पहनाते हैं?
तुलसी को दुल्हन की तरह लाल चुनरी ओढ़ाई जाती है और चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, बिछिया जैसा सोलह शृंगार चढ़ाया जाता है। शालिग्राम को पीला वस्त्र और जनेऊ अर्पित किया जाता है।