त्योहार · बुधवार, 23 दिसंबर 2026
दत्तात्रेय जयंती 2026 कब है? तिथि, जन्म कथा, पूजा विधि और मंत्र
अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
दत्तात्रेय जयंती 2026 बुधवार, 23 दिसंबर को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन है। भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का संयुक्त अवतार और आदि गुरु माना जाता है। इस दिन प्रदोष काल में उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है, गुरुचरित्र का पाठ होता है और 'श्री गुरुदेव दत्त' का जप किया जाता है। तिथि और जन्मोत्सव का समय स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
दत्तात्रेय जयंती 2026: तिथि और मुहूर्त
| दत्तात्रेय जयंती | बुधवार, 23 दिसंबर 2026 |
|---|---|
| तिथि | मार्गशीर्ष पूर्णिमा |
| जन्मोत्सव का समय | प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास) — स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें |
| गुरुचरित्र सप्ताह पाठ | प्रायः जयंती से पहले के सात दिन, जयंती के दिन समापन |
| मोक्षदा एकादशी / गीता जयंती | रविवार, 20 दिसंबर 2026 |
समय नई दिल्ली के अनुसार अनुमानित हैं। सूर्योदय, सूर्यास्त और तिथि शहर के अनुसार बदलती है, इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय का जन्मोत्सव मनाया जाता है। दत्तात्रेय को त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — का एकीकृत रूप और “आदि गुरु” माना जाता है। नाथ संप्रदाय, महानुभाव पंथ और दत्त संप्रदाय में उनका विशेष स्थान है, और श्रीपाद श्रीवल्लभ तथा श्री नृसिंह सरस्वती को उनका अवतार माना जाता है। 2026 में यह पर्व बुधवार, 23 दिसंबर को है, मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती के तीन दिन बाद।
दत्तात्रेय जयंती पूजा विधि
- सुबह: स्नान करके व्रत या फलाहार का संकल्प लें। संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें।
- पूजा स्थान: चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान दत्तात्रेय का चित्र या मूर्ति रखें। औदुंबर (गूलर) के पेड़ को दत्त का निवास माना जाता है, इसलिए पास हो तो उसकी भी पूजा करें।
- पूजन: चंदन, हल्दी-कुमकुम, अक्षत, पीले और सफ़ेद फूल, तुलसी दल, धूप और घी का दीपक अर्पित करें।
- पाठ: गुरुचरित्र, दत्त बावनी या अवधूत गीता का पाठ करें। कई भक्त जयंती से सात दिन पहले से गुरुचरित्र का सप्ताह पाठ करते हैं।
- जप: “श्री गुरुदेव दत्त” या “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” का जप करें।
- जन्मोत्सव: प्रदोष काल में दत्त के जन्म का उत्सव मनाएँ — पालना झुलाएँ, भजन गाएँ और आरती करें।
- प्रसाद और दान: सुंठवडा (सोंठ, गुड़, नारियल और मेवों का प्रसाद), खीर या पंचामृत बाँटें। गाय और कुत्तों को भोजन कराना इस दिन विशेष पुण्य माना जाता है।
पूजा सामग्री
दत्तात्रेय का चित्र या मूर्ति, पीला कपड़ा, चौकी, चंदन, हल्दी, कुमकुम, अक्षत, पीले-सफ़ेद फूल, तुलसी दल, औदुंबर के पत्ते (यदि उपलब्ध हों), धूप, घी का दीपक, कपूर, फल, सुंठवडा या मिठाई, पंचामृत और गुरुचरित्र या दत्त बावनी की पुस्तक।
भगवान दत्तात्रेय की जन्म कथा
महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनसूया अपने पतिव्रत धर्म के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं। कहते हैं कि उनके तप और पतिव्रत की चर्चा स्वयं देवर्षि नारद ने देवलोक में की। यह सुनकर माता सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती के मन में उनकी परीक्षा लेने का विचार आया। उन्होंने अपने पतियों — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — से अनसूया के पतिव्रत की परीक्षा लेने का आग्रह किया।
तीनों देव साधुओं का वेश धरकर अत्रि ऋषि के आश्रम पहुँचे, जब ऋषि बाहर गए हुए थे। उन्होंने माता अनसूया से भिक्षा माँगी, पर साथ ही एक कठिन शर्त रखी — “हम भिक्षा तभी लेंगे, जब आप वस्त्र-रहित होकर हमें भोजन परोसेंगी।”
माता अनसूया धर्म-संकट में पड़ गईं। अतिथि को खाली हाथ लौटाना भी अधर्म था और यह शर्त मानना भी। उन्होंने आँखें बंद करके अपने पति का स्मरण किया और अपनी तपःशक्ति से समझ गईं कि ये कोई साधारण साधु नहीं हैं। उन्होंने कमंडल का जल तीनों पर छिड़का, और तीनों देव छोटे-छोटे शिशु बन गए। तब माता ने माँ के वात्सल्य से उन्हें भोजन कराया, दूध पिलाया और पालने में सुला दिया।
जब बहुत समय तक तीनों देव नहीं लौटे, तो तीनों देवियाँ चिंतित होकर आश्रम पहुँचीं। वहाँ अपने पतियों को शिशु रूप में पालने में झूलते देखकर वे चकित रह गईं। उन्होंने माता अनसूया से क्षमा माँगी और अपने पतियों को लौटाने की प्रार्थना की। तब तक अत्रि ऋषि भी लौट आए थे।
माता अनसूया ने तीनों देवों को उनके असली रूप में लौटा दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने वर माँगने को कहा। माता ने कहा, “आप तीनों मेरे पुत्र के रूप में मेरे घर जन्म लें।” त्रिदेवों ने यह वरदान दिया। इसी के फलस्वरूप मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अत्रि और अनसूया के घर भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का अंश था। “दत्त” का अर्थ है “दिया हुआ” — त्रिदेवों ने स्वयं को पुत्र रूप में दे दिया — और अत्रि के पुत्र होने से वे “आत्रेय” कहलाए। इस तरह उनका नाम दत्तात्रेय पड़ा।
कुछ परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा ऋषि ने जन्म लिया। दोनों रूपों में कथा का भाव एक है — सच्ची पवित्रता और मातृ-प्रेम के सामने देवता भी बालक बन जाते हैं।
दत्तात्रेय की शिक्षा: 24 गुरु
भागवत पुराण के एकादश स्कंध में अवधूत दत्तात्रेय राजा यदु को बताते हैं कि उन्होंने 24 गुरुओं से सीखा — जैसे पृथ्वी से सहनशीलता, जल से निर्मलता, आकाश से असंगता, मधुमक्खी से सार ग्रहण करना और मकड़ी से यह समझ कि सृष्टि ईश्वर से निकलकर उसी में लीन हो जाती है। इसका संदेश है कि जो व्यक्ति सजग है, उसके लिए पूरी प्रकृति ही गुरु है।
नियम
- इस दिन सात्विक भोजन करें; मांस-मदिरा से दूर रहें।
- गुरुजनों का आदर करें और संभव हो तो अपने गुरु का पूजन करें।
- गाय, कुत्तों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ।
- मार्गशीर्ष पूर्णिमा होने के कारण इस दिन सत्यनारायण व्रत कथा भी कई घरों में की जाती है।
2026 के सभी प्रमुख पर्वों की सूची हिंदू त्योहार 2026 पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दत्तात्रेय जयंती 2026 में कब है?
भारतीय पंचांगों के अनुसार दत्तात्रेय जयंती बुधवार, 23 दिसंबर 2026 को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन है। पूर्णिमा तिथि का आरंभ-समापन शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए जन्मोत्सव का समय स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?
भगवान दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का संयुक्त अवतार माना जाता है। उन्हें तीन मुख, छह भुजाओं, साथ में गाय और चार कुत्तों के साथ दर्शाया जाता है। वे योग और ज्ञान के आदि गुरु माने जाते हैं।
दत्तात्रेय के साथ चार कुत्ते और गाय क्यों होते हैं?
परंपरागत व्याख्या में चार कुत्ते चार वेदों का और गाय पृथ्वी या धर्म का प्रतीक मानी जाती है। इसका भाव यह है कि वेद और धर्म सदा गुरु के साथ रहते हैं।
दत्त जयंती पर कौन सा मंत्र जपें?
सबसे सरल और प्रचलित जप 'श्री गुरुदेव दत्त' और 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' है। कई भक्त 'ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः' का भी जप करते हैं। गुरु से दीक्षा ली हो तो उनके बताए मंत्र का जप करें।
दत्तात्रेय जयंती कहाँ सबसे अधिक मनाई जाती है?
महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश में दत्त जयंती बड़े उत्साह से मनाई जाती है। गाणगापुर, नरसोबाची वाडी, औदुंबर, माहुर और गिरनार जैसे दत्त क्षेत्रों में विशेष उत्सव और मेले लगते हैं।
दत्तात्रेय के 24 गुरु कौन थे?
भागवत पुराण में दत्तात्रेय (अवधूत) राजा यदु को बताते हैं कि उन्होंने पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, हिरण, मछली, पिंगला, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, साँप, मकड़ी और भृंग आदि 24 गुरुओं से सीख ली। इसका अर्थ है कि सजग व्यक्ति पूरी प्रकृति से सीख सकता है।