तीर्थ · ओडिशा · चार धाम
जगन्नाथ पुरी मंदिर: कथा, रथ यात्रा, महाप्रसाद और दर्शन
अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
जगन्नाथ पुरी ओडिशा के पुरी शहर में भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण/विष्णु का रूप), उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का मंदिर है। यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों में पूर्व का धाम है। यहाँ की मूर्तियाँ नीम की लकड़ी की हैं और हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को विश्व-प्रसिद्ध रथ यात्रा निकलती है।
जगन्नाथ पुरी: एक नज़र में
| स्थान | पुरी, ओडिशा (बंगाल की खाड़ी के तट पर) |
|---|---|
| मुख्य देवता | जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन |
| मूर्तियाँ | नीम की लकड़ी (दारु ब्रह्म) |
| मंदिर निर्माण | वर्तमान मंदिर 12वीं शताब्दी, राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव के समय से |
| धाम | चार धाम में पूर्व का धाम |
| प्रमुख पर्व | रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया), स्नान पूर्णिमा, नवकलेवर |
| प्रसाद | महाप्रसाद, आनंद बाज़ार में |
दर्शन का समय, यात्रा के नियम और व्यवस्थाएँ समय-समय पर बदलती हैं, इसलिए यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि करें।
“जगन्नाथ” का अर्थ है — जगत के नाथ। पुरी के इस मंदिर में भगवान बड़ी-बड़ी गोल आँखों वाले, बिना पूरे हाथ-पैर के रूप में विराजते हैं, और फिर भी करोड़ों भक्तों के लिए वे सबसे अपने भगवान हैं। ओडिशा की संस्कृति, भोजन, कला और त्योहार — सब कुछ जगन्नाथ के चारों ओर घूमता है।
जगन्नाथ जी की कथा
सबसे प्रसिद्ध कथा मालवा के राजा इंद्रद्युम्न की है, जो स्कंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य और ओड़िया परंपरा में मिलती है।
राजा इंद्रद्युम्न विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें पता चला कि भगवान नील माधव के रूप में कहीं वन में गुप्त रूप से पूजे जाते हैं। राजा ने ब्राह्मण विद्यापति को खोज में भेजा। विद्यापति शबर (आदिवासी) मुखिया विश्वावसु के गाँव पहुँचे, जो गुप्त रूप से नील माधव की पूजा करते थे। विद्यापति ने विश्वावसु की बेटी ललिता से विवाह किया और बहुत आग्रह के बाद आँखों पर पट्टी बाँधकर नील माधव के दर्शन किए। रास्ते में वे चुपचाप सरसों के दाने गिराते गए।
जब राजा उस रास्ते से वहाँ पहुँचे, तो नील माधव अंतर्धान हो चुके थे। दुखी राजा को आकाशवाणी हुई कि भगवान समुद्र में बहकर आने वाले दारु (पवित्र लकड़ी के लट्ठे) के रूप में प्रकट होंगे।
लकड़ी तो आ गई, पर कोई शिल्पी उसे गढ़ नहीं सका। तब एक बूढ़ा बढ़ई आया — मान्यता है कि वे स्वयं विश्वकर्मा (कुछ कथाओं में स्वयं भगवान) थे। उन्होंने शर्त रखी कि वे 21 दिन तक बंद कमरे में काम करेंगे और कोई दरवाज़ा न खोले। कुछ दिनों बाद अंदर से आवाज़ आनी बंद हो गई। चिंतित रानी गुंडिचा के आग्रह पर राजा ने दरवाज़ा खुलवा दिया। बढ़ई ग़ायब थे और तीनों मूर्तियाँ अधूरी थीं — बिना पूरे हाथ-पैर के। तब भगवान ने स्वप्न में कहा कि वे इसी रूप में पूजे जाना चाहते हैं।
परंपराओं में अंतर: कहानी के कई रूप हैं — कहीं 21 दिन की शर्त है, कहीं 15 दिन की; कहीं शिल्पी विश्वकर्मा हैं, कहीं स्वयं विष्णु। शबर समुदाय से जुड़ी यह कथा बताती है कि जगन्नाथ की पूजा में आदिवासी परंपरा की गहरी जड़ें हैं; आज भी मंदिर के दैतापति सेवक स्वयं को विश्वावसु का वंशज मानते हैं।
मंदिर का इतिहास और परिसर
वर्तमान मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव के समय शुरू हुआ। मंदिर का ऊँचा शिखर दूर से दिखता है, और उस पर लगा नील चक्र और हर दिन बदला जाने वाला ध्वज विशेष आकर्षण हैं।
परिसर में प्रमुख स्थान:
- रत्न सिंहासन पर विराजे जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन।
- विमला देवी मंदिर, जिसे शक्तिपीठों में गिना जाता है।
- आनंद बाज़ार, जहाँ महाप्रसाद मिलता है।
- मंदिर की रसोई, जिसे विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में गिना जाता है।
चार धाम में पुरी
आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार धाम माने — उत्तर में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम। उन्होंने पुरी में गोवर्धन मठ की स्थापना भी की। चार धाम के दोनों अर्थों के लिए चार धाम यात्रा पढ़ें।
रथ यात्रा
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को तीनों देवता मंदिर से बाहर आकर तीन विशाल रथों पर विराजते हैं:
| देवता | रथ का नाम |
|---|---|
| जगन्नाथ | नंदीघोष |
| बलभद्र | तालध्वज |
| सुभद्रा | दर्पदलन (देवदलन) |
लाखों भक्त रस्सियाँ खींचकर रथों को गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं, जिसे भगवान की मौसी का घर कहा जाता है। पुरी के गजपति राजा रथ के आगे सोने की झाड़ू से मार्ग बुहारते हैं — इसे छेरा पहँरा कहते हैं, जो बताता है कि भगवान के सामने राजा भी सेवक है। लगभग एक सप्ताह बाद बाहुड़ा यात्रा में देवता लौटते हैं।
रथ यात्रा से पहले स्नान पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) पर देवताओं को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि इसके बाद भगवान “बीमार” पड़ जाते हैं और लगभग 15 दिन (अनासर काल) तक दर्शन नहीं होते।
महाप्रसाद
जगन्नाथ का भोग मिट्टी के बर्तनों में, लकड़ी की आग पर, एक के ऊपर एक रखे बर्तनों में पकाया जाता है। पहले यह भगवान को, फिर विमला देवी को अर्पित होता है और तब महाप्रसाद बनता है। आनंद बाज़ार में हर जाति और वर्ग के लोग साथ बैठकर इसे ग्रहण करते हैं — यह जगन्नाथ संस्कृति की समानता का प्रतीक है।
दर्शन से पहले ज़रूरी बातें
- मंदिर की परंपरा के अनुसार मुख्य मंदिर में केवल हिंदुओं को प्रवेश दिया जाता है।
- मोबाइल, कैमरा और चमड़े का सामान अंदर ले जाने पर रोक रहती है; सामान रखने की व्यवस्था बाहर होती है।
- दर्शन का समय अनुष्ठानों के अनुसार दिन में कई बार बदलता है और त्योहारों पर विशेष व्यवस्था होती है — मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि करें।
- रथ यात्रा के दिनों में भारी भीड़ होती है; ठहरने की व्यवस्था पहले से करें।
जगन्नाथ अष्टकम् और मंत्र
आदि शंकराचार्य की परंपरा से जुड़े जगन्नाथाष्टकम् की हर पंक्ति इस टेक पर समाप्त होती है:
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥
अर्थ: जगत के स्वामी जगन्नाथ मेरे नेत्रों के मार्ग में आएँ — यानी मुझे सदा उनके दर्शन होते रहें।
सरल जप के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और हरे कृष्ण महामंत्र देखें। जगन्नाथ के भक्त-कवि जयदेव का गीतगोविंद भी यहीं की परंपरा का अंग है।
अन्य पर्व
रथ यात्रा के अलावा कार्तिक मास में पुरी में विशेष भीड़ रहती है; कार्तिक पूर्णिमा पर समुद्र-स्नान और दीपदान होता है। देव उठनी एकादशी और हर एकादशी पर भी विशेष पूजा होती है।
अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए Lord Jagannath (English) देखें। अन्य तीर्थों के लिए तीर्थ अनुभाग देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जगन्नाथ पुरी में किसकी पूजा होती है?
मुख्य गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण/विष्णु), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम), बहन सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की पूजा होती है। मंदिर परिसर में विमला देवी (शक्तिपीठ), लक्ष्मी जी और अनेक छोटे मंदिर भी हैं।
जगन्नाथ जी की मूर्ति अधूरी क्यों है?
कथा के अनुसार शिल्पी (विश्वकर्मा, जो बूढ़े बढ़ई के रूप में आए) ने शर्त रखी थी कि जब तक काम पूरा न हो, दरवाज़ा न खोला जाए। रानी गुंडिचा ने चिंता में दरवाज़ा पहले ही खोल दिया, शिल्पी अदृश्य हो गए और मूर्तियाँ बिना हाथ-पैर के अधूरी रह गईं। भगवान ने इसी रूप में पूजे जाने की इच्छा जताई।
जगन्नाथ रथ यात्रा कब होती है?
रथ यात्रा हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होती है, जो प्रायः जून-जुलाई में आती है। तीनों देवता रथों पर बैठकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, लगभग एक सप्ताह वहाँ रहते हैं और बाहुड़ा यात्रा में लौटते हैं।
क्या गैर-हिंदू जगन्नाथ मंदिर में जा सकते हैं?
मंदिर की पुरानी परंपरा और प्रबंधन की नीति के अनुसार मुख्य मंदिर में केवल हिंदुओं को प्रवेश दिया जाता है। रथ यात्रा के समय सभी लोग रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन कर सकते हैं। नियमों की ताज़ा जानकारी मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से लें।
जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद क्या है?
मंदिर की विशाल रसोई में मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी की आग पर बना भोग पहले भगवान को और फिर विमला देवी को अर्पित होता है, तब वह महाप्रसाद बनता है। इसे मंदिर परिसर के आनंद बाज़ार में बाँटा और बेचा जाता है, और यहाँ जाति-भेद के बिना सब साथ बैठकर प्रसाद लेते हैं।
नवकलेवर क्या है?
नवकलेवर का अर्थ है नया शरीर। जिस वर्ष आषाढ़ में अधिक मास पड़ता है, उस वर्ष विशेष नीम के पेड़ खोजकर नई मूर्तियाँ बनाई जाती हैं और 'ब्रह्म पदार्थ' पुरानी मूर्तियों से नई में स्थानांतरित किया जाता है। यह सामान्यतः 12 से 19 वर्ष के अंतर पर होता है; पिछला नवकलेवर 2015 में हुआ था।