व्रत कथा · हर पक्ष की एकादशी
एकादशी व्रत कथा: व्रत विधि, पारण, नियम और 24 एकादशियों के नाम
अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
एकादशी व्रत भगवान विष्णु का व्रत है, जो हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को रखा जाता है, यानी साल में 24 बार (अधिक मास में 26)। व्रत दशमी की शाम से शुरू होकर द्वादशी को पारण के साथ पूरा होता है। एकादशी के दिन चावल और अन्न नहीं खाया जाता, विष्णु पूजा, कथा, जप और जागरण किया जाता है, और अगले दिन तय पारण समय में व्रत खोला जाता है।
एकादशी व्रत कथा: एक नज़र में
| देवता | भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण, राम सहित) |
|---|---|
| तिथि | हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशी |
| व्रत की अवधि | दशमी की शाम से द्वादशी के पारण तक |
| पारण | द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर |
| मुख्य वर्जित | चावल, गेहूँ, दालें और सभी अनाज |
| आने वाली एकादशी | देव उठनी 20 नवंबर, उत्पन्ना दिसंबर की शुरुआत, मोक्षदा 20 दिसंबर 2026 |
व्रत की तिथि, प्रदोष काल और पूजा का समय शहर और परंपरा के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
एकादशी को हिंदू धर्म के सबसे पुण्यदायी व्रतों में गिना जाता है। हर एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना फल है — जैसे पापों से मुक्ति के लिए पापमोचनी, संतान के लिए पुत्रदा और पितरों की मुक्ति के लिए मोक्षदा। पर सभी एकादशियों की मूल भावना एक है: एक दिन अन्न छोड़कर मन को भगवान विष्णु में लगाना। इस पृष्ठ पर एकादशी व्रत की सामान्य विधि, नियम और राजा अंबरीष की वह प्रसिद्ध कथा है, जो एकादशी व्रत की महिमा बताती है।
एकादशी व्रत विधि
- दशमी की शाम: दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। उस रात चावल, लहसुन-प्याज़ न खाएँ और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- एकादशी की सुबह: स्नान करके भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें कि आप निर्जला, फलाहार या एक समय फलाहार — किस प्रकार का व्रत रखेंगे।
- पूजा: विष्णु या श्रीकृष्ण के चित्र या शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराएँ, पीले फूल, पीला चंदन, अक्षत, तुलसी दल, धूप-दीप और फल अर्पित करें। तुलसी पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रखें — एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- कथा और जप: उस एकादशी की कथा पढ़ें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें।
- आरती: ॐ जय जगदीश हरे आरती करें।
- रात्रि: संभव हो तो भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
- द्वादशी पारण: अगले दिन पारण समय में किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान देकर, तुलसी जल लेकर व्रत खोलें।
पूजा सामग्री
विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र अथवा शालिग्राम, पीला कपड़ा, पंचामृत, गंगाजल, पीले फूल, तुलसी दल (पहले से तोड़े हुए), पीला चंदन, अक्षत, धूप, घी का दीपक, मौसमी फल, मिठाई या पंचमेवा और जल का लोटा।
एकादशी व्रत कथा: राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
सूर्यवंश में अंबरीष नाम के एक महान राजा हुए। वे सातों द्वीपों के स्वामी थे, फिर भी उनका मन धन-वैभव में नहीं, भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता था। वे नियम से हर एकादशी का व्रत रखते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने अपना सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया था।
एक बार राजा अंबरीष ने पूरे वर्ष एकादशी व्रत करने का संकल्प लिया। वर्ष की अंतिम एकादशी के बाद द्वादशी को वे पारण की तैयारी कर रहे थे। तभी महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ वहाँ पधारे। राजा ने आदरपूर्वक उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया। दुर्वासा ऋषि ने निमंत्रण स्वीकार किया और कहा कि वे यमुना में स्नान करके आते हैं।
ऋषि स्नान और ध्यान में इतने लीन हो गए कि बहुत देर हो गई। उधर द्वादशी तिथि समाप्त होने वाली थी। राजा धर्म-संकट में पड़ गए — यदि द्वादशी में पारण नहीं किया तो व्रत भंग होगा, और यदि अतिथि से पहले भोजन किया तो अतिथि का अपमान होगा। तब विद्वान ब्राह्मणों ने सलाह दी कि केवल जल ग्रहण कर लेने से पारण भी हो जाएगा और जल भोजन नहीं माना जाता, इसलिए अतिथि का अपमान भी नहीं होगा। राजा ने भगवान का स्मरण करके थोड़ा सा जल पी लिया।
दुर्वासा ऋषि लौटे तो अपनी तपःशक्ति से जान गए कि राजा ने जल ले लिया है। वे क्रोध से भर उठे और बोले कि तुमने अतिथि का अपमान किया है। क्रोध में उन्होंने अपनी जटा से एक भयंकर कृत्या (राक्षसी) उत्पन्न की और उसे राजा को मारने भेजा। राजा अंबरीष हाथ जोड़कर शांत खड़े रहे। तभी सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ, उसने कृत्या को भस्म कर दिया और फिर दुर्वासा ऋषि के पीछे चल पड़ा।
दुर्वासा ऋषि अपने प्राण बचाने के लिए ब्रह्मा जी के पास गए, फिर भगवान शिव के पास, पर दोनों ने कहा कि वे भगवान विष्णु के चक्र को नहीं रोक सकते। अंत में वे वैकुंठ पहुँचे और भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े। भगवान ने कहा, “हे मुनि, मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ। मेरे भक्त ने सब कुछ छोड़कर मुझे अपना माना है, इसलिए मैं भी उन्हें नहीं छोड़ सकता। आपको क्षमा वही दे सकते हैं, जिनका आपने अपराध किया है।”
दुर्वासा ऋषि लौटकर राजा अंबरीष के पास गए। राजा पूरे एक वर्ष से, यानी जब से ऋषि गए थे, बिना भोजन किए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। ऋषि को देखते ही उन्होंने सुदर्शन चक्र से प्रार्थना की कि ऋषि को क्षमा कर दें। चक्र शांत हो गया। दुर्वासा ऋषि राजा की नम्रता और भक्ति से बहुत प्रभावित हुए। राजा ने उन्हें आदर से भोजन कराया और उसके बाद ही स्वयं भोजन किया।
यह कथा बताती है कि एकादशी का व्रत करने वाले भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं, और व्रत का सच्चा फल विनम्रता और क्षमा में है, अहंकार में नहीं। साथ ही यह द्वादशी के पारण का महत्व भी बताती है।
24 एकादशियों के नाम
| मास | कृष्ण पक्ष | शुक्ल पक्ष |
|---|---|---|
| चैत्र | पापमोचनी | कामदा |
| वैशाख | वरूथिनी | मोहिनी |
| ज्येष्ठ | अपरा | निर्जला |
| आषाढ़ | योगिनी | देवशयनी |
| श्रावण | कामिका | पुत्रदा (पवित्रा) |
| भाद्रपद | अजा | परिवर्तिनी (पद्मा) |
| आश्विन | इंदिरा | पापांकुशा |
| कार्तिक | रमा | देव उठनी (प्रबोधिनी) |
| मार्गशीर्ष | उत्पन्ना | मोक्षदा |
| पौष | सफला | पुत्रदा |
| माघ | षटतिला | जया |
| फाल्गुन | विजया | आमलकी |
(यह क्रम पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार है। अधिक मास में पद्मिनी और परमा एकादशी अतिरिक्त होती हैं।)
व्रत के नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या करें
- दशमी की रात से ही संयम शुरू करें और द्वादशी को समय पर पारण करें।
- दिन भर भगवान का नाम लें, गीता या विष्णु सहस्रनाम पढ़ें।
- द्वादशी को पारण से पहले किसी ज़रूरतमंद को भोजन या अन्न दान करें।
क्या न करें
- एकादशी को चावल, गेहूँ, दालें और सामान्य नमक न खाएँ।
- तुलसी के पत्ते न तोड़ें, बाल और नाखून न काटें।
- हरि वासर में पारण न करें और द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न टालें।
- बीमार, बुज़ुर्ग, बच्चे और गर्भवती महिलाएँ निर्जला व्रत के बजाय फलाहार रखें।
2026 की आने वाली एकादशी
- देव उठनी एकादशी: शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 (स्मार्त); अगले दिन तुलसी विवाह।
- उत्पन्ना एकादशी: मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी, दिसंबर 2026 का पहला सप्ताह — सटीक तारीख स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
- मोक्षदा एकादशी: रविवार, 20 दिसंबर 2026, उसी दिन गीता जयंती।
एकादशी क्या है और इसका दार्शनिक अर्थ क्या है, यह अंग्रेज़ी में What is Ekadashi लेख में पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए?
फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, आलू, शकरकंद, मूँगफली, मखाना और कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा के आटे की चीज़ें सेंधा नमक के साथ ली जा सकती हैं। चावल, गेहूँ, दालें, बीन्स और सामान्य नमक नहीं लिए जाते। निर्जला व्रत में जल भी नहीं पिया जाता।
एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?
लोक मान्यता है कि एकादशी के दिन अन्न, विशेषकर चावल, में पाप का वास होता है, इसलिए व्रत न रखने वाले भी इस दिन चावल नहीं खाते। व्यावहारिक रूप से अनाज छोड़ने से शरीर हल्का रहता है और मन जप-ध्यान में लगता है।
एकादशी व्रत का पारण कब और कैसे करें?
पारण द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) समाप्त होने पर करना चाहिए। द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण अवश्य कर लें। तुलसी दल और जल लेकर, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। सटीक समय स्थानीय पंचांग से देखें।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो दिनों के सूर्योदय को छूती है, तो पंचांग दो तारीखें देते हैं। गृहस्थ (स्मार्त) प्रायः पहले दिन व्रत रखते हैं और वैष्णव, इस्कॉन आदि दूसरे दिन। अपनी परंपरा के अनुसार चुनें।
साल में कितनी एकादशी होती हैं?
सामान्य वर्ष में 24 एकादशी होती हैं — हर महीने दो। जिस वर्ष अधिक (पुरुषोत्तम) मास होता है, उसमें दो अतिरिक्त एकादशी, पद्मिनी और परमा, जुड़कर 26 हो जाती हैं।
एकादशी व्रत कब से शुरू करना चाहिए?
परंपरा में मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी से व्रत शुरू करना सबसे शुभ माना जाता है, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी प्रकट हुई थीं। 2026 में यह दिसंबर के पहले सप्ताह में है।