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51 शक्तिपीठ: सती की कथा, प्रमुख शक्तिपीठों के नाम और स्थान

अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026

शक्तिपीठ वे पवित्र स्थान हैं जहाँ देवी सती के शरीर के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे थे। कथा के अनुसार दक्ष के यज्ञ में सती के देह-त्याग के बाद शोक में डूबे शिव उनका शरीर लेकर घूमने लगे, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसके टुकड़े किए। सबसे प्रचलित गिनती 51 शक्तिपीठों की है, पर अलग ग्रंथों में 4, 18, 52 और 108 की सूचियाँ भी मिलती हैं। हर शक्तिपीठ में देवी के साथ एक भैरव की पूजा होती है।

शक्तिपीठ: एक नज़र में

सबसे प्रचलित संख्या51 (पीठ निर्णय / तंत्रचूड़ामणि के अनुसार)
अन्य गिनतियाँ4 आदि शक्तिपीठ, 18 महाशक्तिपीठ, 52, और देवी भागवत में 108
कथा का स्रोतकालिका पुराण, देवी भागवत पुराण, तंत्र ग्रंथ
देवी-भैरवहर पीठ में शक्ति (देवी) और भैरव (शिव) दोनों
देशभारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, तिब्बत
प्रमुख पर्वचैत्र और शारदीय नवरात्रि; कामाख्या में अंबुबाची मेला

दर्शन का समय, यात्रा के नियम और व्यवस्थाएँ समय-समय पर बदलती हैं, इसलिए यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि करें।

नवरात्रि आते ही देश भर के देवी मंदिरों में भीड़ उमड़ पड़ती है, पर कुछ स्थान ऐसे हैं जिन्हें स्वयं देवी का “पीठ” — आसन — माना जाता है। ये हैं शक्तिपीठ। असम के कामाख्या से बलूचिस्तान के हिंगलाज तक और कश्मीर से श्रीलंका तक फैले ये पीठ बताते हैं कि देवी की उपासना पूरे उपमहाद्वीप की साझा विरासत है।

सती और शक्तिपीठों की कथा

सती प्रजापति दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं। दक्ष को शिव पसंद नहीं थे — श्मशान में रहने वाले, भस्म रमाने वाले वैरागी। एक बार दक्ष ने महान यज्ञ किया और सब देवताओं को बुलाया, केवल शिव को नहीं।

शिव के मना करने पर भी सती पिता के यज्ञ में गईं। वहाँ दक्ष ने सबके सामने शिव का अपमान किया। पति का अपमान न सह पाने के कारण सती ने योगाग्नि से वहीं देह त्याग दी। समाचार मिलते ही शिव के क्रोध से वीरभद्र प्रकट हुए और उन्होंने दक्ष का यज्ञ नष्ट कर दिया।

फिर शोक में डूबे शिव सती का शरीर कंधे पर उठाकर संसार में घूमने लगे, और उनके तांडव से सृष्टि डगमगाने लगी। संतुलन लौटाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वहाँ देवी की शक्ति जाग्रत हो गई — यही शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि शिव हर पीठ पर भैरव रूप में रक्षक बनकर स्थित हुए।

बाद में सती ने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया और तपस्या से फिर शिव को पाया — इस प्रकार यह कथा वियोग से पुनर्मिलन तक जाती है।

ग्रंथों में अंतर: दक्ष यज्ञ और सती के देह-त्याग की कथा कई पुराणों में है, पर शरीर के खंडित होने और पीठ बनने का विवरण मुख्यतः बाद के ग्रंथों — कालिका पुराण, देवी भागवत पुराण और तंत्र ग्रंथों — में मिलता है। किस पीठ पर कौन-सा अंग गिरा, इस पर भी अलग सूचियों में अंतर है।

संख्या में अंतर क्यों — 4, 18, 51, 52 या 108?

संख्या स्रोत / परंपरा टिप्पणी
4 आदि शक्तिपीठ लोक और भक्ति परंपरा कामाख्या, कालीघाट, विमला (पुरी), तारा तारिणी
18 महाशक्तिपीठ आदि शंकराचार्य से जुड़ा अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र दक्षिण भारत में विशेष रूप से प्रचलित
51 शक्तिपीठ तंत्रचूड़ामणि का पीठ निर्णय संस्कृत वर्णमाला के 51 अक्षरों से जोड़ा जाता है
52 कुछ बाद की सूचियाँ 51 में एक पीठ और जोड़ी गई
108 देवी भागवत पुराण देवी के पवित्र स्थानों की बड़ी सूची

ये अंतर विरोधाभास नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रीय और ग्रंथीय परंपराएँ हैं। कुछ पीठों के स्थान पर भी एक से अधिक मंदिर दावा करते हैं।

4 आदि शक्तिपीठ

  1. कामाख्या — नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम। सबसे प्रमुख तांत्रिक पीठ, जहाँ सती की योनि गिरी मानी जाती है। यहाँ अंबुबाची मेला प्रसिद्ध है।
  2. कालीघाट — कोलकाता, पश्चिम बंगाल। यहाँ दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरी मानी जाती हैं; देवी काली रूप में पूजी जाती हैं।
  3. विमला — जगन्नाथ पुरी मंदिर परिसर, ओडिशा। जगन्नाथ का भोग विमला देवी को अर्पित होने के बाद ही महाप्रसाद बनता है।
  4. तारा तारिणी — बरहमपुर (ब्रह्मपुर) के पास कुमारी पहाड़ी, ओडिशा।

18 महाशक्तिपीठ (अष्टादश सूची)

क्रम देवी स्थान
1 शंकरी देवी त्रिंकोमाली, श्रीलंका
2 कामाक्षी कांचीपुरम, तमिलनाडु
3 शृंखला देवी पांडुआ, पश्चिम बंगाल (स्थान पर मतभेद)
4 चामुंडेश्वरी मैसूर, कर्नाटक
5 जोगुलांबा आलमपुर, तेलंगाना
6 भ्रमरांबा श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश
7 महालक्ष्मी कोल्हापुर, महाराष्ट्र
8 एकवीरा (रेणुका) माहुर, महाराष्ट्र
9 महाकाली उज्जैन, मध्य प्रदेश
10 पुरुहूतिका पीठापुरम, आंध्र प्रदेश
11 गिरिजा (बिरजा) जाजपुर, ओडिशा
12 माणिक्यांबा द्राक्षारामम, आंध्र प्रदेश
13 कामरूपा (कामाख्या) गुवाहाटी, असम
14 माधवेश्वरी (अलोपी देवी) प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
15 वैष्णवी (ज्वालामुखी) कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
16 मंगला गौरी गया, बिहार
17 विशालाक्षी वाराणसी, उत्तर प्रदेश
18 सरस्वती (शारदा) कश्मीर

इनमें से कई शक्तिपीठ ज्योतिर्लिंगों के पास हैं — श्रीशैलम में भ्रमरांबा और मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकाली और महाकालेश्वर। विस्तार के लिए 12 ज्योतिर्लिंग पढ़ें।

अन्य प्रसिद्ध शक्तिपीठ

  • हिंगलाज माता — बलूचिस्तान, पाकिस्तान; ब्रह्मरंध्र (सिर का भाग) गिरा माना जाता है। आज भी हिंदू तीर्थयात्री यहाँ जाते हैं।
  • ज्वालामुखी — कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश; जिह्वा गिरी मानी जाती है। यहाँ चट्टानों से निकलती प्राकृतिक ज्योतियों की पूजा होती है।
  • नैना देवी — बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश; नेत्र गिरे माने जाते हैं।
  • अंबाजी — बनासकांठा, गुजरात; हृदय गिरा माना जाता है। यहाँ मूर्ति के बजाय श्री यंत्र की पूजा होती है।
  • गुह्येश्वरी — काठमांडू, नेपाल, पशुपतिनाथ के पास।
  • जशोरेश्वरी और सुगंधा — बांग्लादेश।

अंगों का विवरण प्रचलित सूचियों के अनुसार है; अलग ग्रंथ और मंदिर कभी-कभी एक ही स्थान के लिए अलग अंग बताते हैं।

शक्ति और भैरव

हर शक्तिपीठ में दो देवता होते हैं — शक्ति (देवी का स्थानीय रूप) और भैरव (शिव का रक्षक रूप)। जैसे कामाख्या में देवी कामाख्या और भैरव उमानंद हैं। परंपरा है कि देवी के दर्शन के बाद भैरव के दर्शन से यात्रा पूर्ण होती है। भैरव के स्वरूप और कथा के लिए काल भैरव पढ़ें।

शक्तिपीठों के दर्शन

  • नवरात्रि — चैत्र और शारदीय दोनों — शक्तिपीठों का सबसे बड़ा पर्व है; इस समय सबसे अधिक भीड़ होती है। पूजा-विधि के लिए नवरात्रि 2026 पढ़ें।
  • कामाख्या का अंबुबाची मेला आषाढ़ (जून) में लगता है, जब तीन दिन मंदिर बंद रहता है।
  • दर्शन का समय, विशेष पूजा और विदेश स्थित पीठों के लिए वीज़ा/अनुमति के नियम बदलते रहते हैं — यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि करें।

देवी के मंत्र

शक्तिपीठों में सबसे प्रचलित देवी-मंत्र नवार्ण मंत्र है:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

और देवी-स्तुति का यह प्रसिद्ध श्लोक (दुर्गा सप्तशती से):

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अर्थ: जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।

सरल जप के लिए दुर्गा मंत्र और काली मंत्र देखें। उत्तर भारत के सबसे बड़े देवी-तीर्थ के लिए वैष्णो देवी पढ़ें।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए Shakti Peeth (English) देखें। अन्य तीर्थों के लिए तीर्थ अनुभाग देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शक्तिपीठ कितने हैं — 51 या 52?

सबसे प्रचलित गिनती 51 की है, जो तंत्रचूड़ामणि के 'पीठ निर्णय' पर आधारित है और संस्कृत वर्णमाला के 51 अक्षरों से जोड़ी जाती है। कुछ बाद की सूचियों में एक पीठ और जोड़कर 52 गिने जाते हैं। देवी भागवत पुराण 108 पीठों की बात करता है, और आदि शंकराचार्य से जुड़े स्तोत्र में 18 महाशक्तिपीठ हैं।

शक्तिपीठ कैसे बने?

दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव का अपमान किया, तो उनकी पुत्री सती ने वहीं देह त्याग दी। शोक में शिव सती का शरीर उठाकर तांडव करते हुए घूमने लगे और सृष्टि डगमगाने लगी। तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया; जहाँ-जहाँ अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने।

4 आदि शक्तिपीठ कौन-से हैं?

प्रचलित परंपरा में चार आदि शक्तिपीठ हैं — कामाख्या (गुवाहाटी, असम), कालीघाट (कोलकाता), विमला देवी (जगन्नाथ मंदिर परिसर, पुरी) और तारा तारिणी (बरहमपुर के पास, ओडिशा)।

हर शक्तिपीठ में भैरव क्यों होते हैं?

मान्यता है कि सती के अंग जहाँ गिरे, वहाँ शिव भैरव रूप में उस पीठ की रक्षा के लिए स्थित हो गए। इसलिए हर शक्तिपीठ में देवी के साथ उस पीठ के भैरव की भी पूजा होती है, और परंपरा है कि भैरव के दर्शन से ही पीठ की यात्रा पूरी होती है।

भारत के बाहर कौन-से शक्तिपीठ हैं?

हिंगलाज माता (बलूचिस्तान, पाकिस्तान), गुह्येश्वरी (काठमांडू, नेपाल), जशोरेश्वरी और सुगंधा (बांग्लादेश), शंकरी देवी (त्रिंकोमाली, श्रीलंका) और मानसरोवर क्षेत्र (तिब्बत) प्रमुख हैं।

क्या वैष्णो देवी शक्तिपीठ है?

51 शक्तिपीठों की प्रमुख शास्त्रीय सूचियों में वैष्णो देवी का नाम नहीं है। कुछ परंपराएँ यहाँ सती के अंग गिरने की बात मानती हैं, इसलिए कई भक्त इसे शक्तिपीठ कहते हैं। इस पर मतभेद है।

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