देवी-देवता · कालाष्टमी

काल भैरव कौन हैं? कथा, मंत्र, अष्टमी और मंदिर

अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026

काल भैरव भगवान शिव का उग्र रूप हैं, जो शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटा और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति काशी में पाई, इसलिए वे 'काशी के कोतवाल' कहलाते हैं। उनकी पूजा हर महीने की कृष्ण अष्टमी (कालाष्टमी) और विशेष रूप से मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को काल भैरव जयंती पर होती है।

काल भैरव: एक नज़र में

स्वरूपभगवान शिव का उग्र रूप
अन्य नामभैरव बाबा, काशी के कोतवाल, दंडपाणि, क्षेत्रपाल
वाहनश्वान (कुत्ता)
प्रमुख तिथिकाल भैरव जयंती — मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी (नवंबर-दिसंबर)
मासिक व्रतहर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी (कालाष्टमी)
प्रमुख मंदिरकाल भैरव मंदिर, वाराणसी; काल भैरव मंदिर, उज्जैन
प्रसिद्ध स्तोत्रकालभैरवाष्टकम् (आदि शंकराचार्य की परंपरा)

कथाओं और पूजा-विधि के रूप क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं; अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।

काशी की गलियों में एक कहावत चलती है — “काशी में बाबा विश्वनाथ राजा हैं, तो काल भैरव कोतवाल।” काल भैरव भगवान शिव का वह उग्र रूप हैं जो भय को भी भय देते हैं। उनका रूप भयंकर है, पर भक्त के लिए वे सबसे बड़े रक्षक हैं।

काल भैरव की उत्पत्ति की कथा

शिव पुराण (शतरुद्र संहिता) और कुछ अन्य पुराणों में यह कथा मिलती है। एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में बहस हुई कि सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ कौन है। वेदों ने उत्तर दिया कि सर्वोच्च तो शिव हैं। विष्णु जी ने यह स्वीकार कर लिया, पर उस समय ब्रह्मा जी के पाँच सिर थे और उनके पाँचवें सिर ने अहंकार में शिव का अपमान किया।

तब शिव के क्रोध से एक प्रचंड रूप प्रकट हुआ — भैरव। भैरव ने अपने नाख़ून से ब्रह्मा का वह पाँचवाँ सिर काट दिया। तभी से ब्रह्मा चतुर्मुख हैं।

पर ब्रह्मा का सिर काटने से भैरव पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। ब्रह्मा का कटा हुआ कपाल उनके हाथ से चिपक गया। शिव के आदेश से भैरव कपाल हाथ में लिए भिक्षुक बनकर तीनों लोकों में घूमते रहे, और ब्रह्महत्या एक स्त्री के रूप में उनके पीछे-पीछे चलती रही। जब वे काशी पहुँचे, तो कपाल उनके हाथ से छूटकर गिर गया और ब्रह्महत्या वहीं समाप्त हो गई। जहाँ कपाल गिरा, वह स्थान कपालमोचन तीर्थ कहलाया।

शिव ने भैरव को काशी का रक्षक — कोतवाल — नियुक्त किया। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले या बाद में काल भैरव के दर्शन किए बिना काशी यात्रा पूरी नहीं होती।

कथा के रूप: कुछ पुराणों में विवाद ब्रह्मा और विष्णु के बीच है, कुछ में ऋषियों की सभा में। कहीं भैरव शिव के क्रोध से जन्म लेते हैं, कहीं शिव स्वयं भैरव बनते हैं। मूल भाव सभी में एक है — अहंकार का नाश।

काल भैरव का स्वरूप

काल भैरव का रंग श्याम है, वे दिगंबर हैं, गले में मुंडमाला और हाथों में त्रिशूल, डमरू, खड्ग और कपाल धारण करते हैं। उनका वाहन श्वान (कुत्ता) है, इसलिए भैरव भक्त कुत्तों को भोजन कराते हैं। तंत्र परंपरा में भैरव के आठ रूप — अष्ट भैरव — माने गए हैं, और हर शक्तिपीठ में देवी के साथ एक भैरव की पूजा होती है।

काल भैरव के प्रमुख मंदिर

  • काल भैरव मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश): काशी के कोतवाल का सबसे प्रसिद्ध मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के पास। यहाँ काले धागे का रक्षा-सूत्र बँधवाने की परंपरा है।
  • काल भैरव मंदिर, उज्जैन (मध्य प्रदेश): यहाँ भैरव को मदिरा का भोग लगाने की सदियों पुरानी परंपरा है। उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ भक्त यहाँ भी जाते हैं।
  • बटुक भैरव और अन्य मंदिर: काशी, दिल्ली (पुराना किला के पास किलकारी भैरव मंदिर) और देश भर के शक्तिपीठों में भैरव मंदिर हैं।

दर्शन का समय, आरती और भीड़ की व्यवस्था मंदिर के अनुसार बदलती है — यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट या प्रबंधन से पुष्टि करें।

काल भैरव जयंती और कालाष्टमी

काल भैरव जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण अष्टमी को मनाई जाती है — माना जाता है कि इसी दिन भैरव प्रकट हुए थे। यह प्रायः नवंबर-दिसंबर में आती है, यानी कार्तिक पूर्णिमा के लगभग एक सप्ताह बाद। हर महीने की कृष्ण अष्टमी को कालाष्टमी का व्रत रखा जाता है।

इस दिन की सरल पूजा:

  1. सुबह स्नान करके शिव और भैरव का स्मरण करें।
  2. शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाएँ, काले तिल और उड़द अर्पित करें।
  3. “ॐ कालभैरवाय नमः” का 108 बार जप करें या कालभैरवाष्टक पढ़ें।
  4. इमरती, जलेबी या नारियल का भोग लगाएँ, और किसी कुत्ते को रोटी खिलाएँ।
  5. कई भक्त रात्रि जागरण करते हैं।

काल भैरव के मंत्र

सरल नाम मंत्र:

ॐ कालभैरवाय नमः

कालभैरवाष्टकम् का पहला श्लोक (आदि शंकराचार्य की परंपरा से):

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्। नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥

अर्थ: जिनके पवित्र चरण-कमलों की सेवा देवराज इंद्र करते हैं, जो सर्प को यज्ञोपवीत की तरह पहनते हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा है, जो कृपा के भंडार हैं, जिन्हें नारद आदि योगी प्रणाम करते हैं, उन दिगंबर, काशी नगरी के स्वामी काल भैरव को मैं भजता हूँ।

भैरव शिव का ही रूप हैं, इसलिए ॐ नमः शिवाय और महामृत्युंजय मंत्र का जप भी भैरव पूजा में किया जाता है। शिव-भक्ति के साप्ताहिक व्रत के लिए सोमवार व्रत कथा भी पढ़ें।

काल भैरव और शनि

लोक-मान्यता में काल भैरव को शनि देव का गुरु माना जाता है, इसलिए शनि की साढ़ेसाती या ढैया के समय भी भक्त भैरव की पूजा करते हैं। यह लोक परंपरा है, किसी प्रमुख पुराण का स्पष्ट कथन नहीं।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए Kaal Bhairav (English) देखें। अन्य लेखों के लिए देवी-देवता अनुभाग और हिंदी मंत्र संग्रह देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

काल भैरव कौन हैं?

काल भैरव भगवान शिव का उग्र और रक्षक रूप हैं। 'काल' का अर्थ समय और मृत्यु दोनों है — काल भैरव वे हैं जिनसे काल भी डरता है। वे भक्तों की रक्षा करते हैं और अहंकार का नाश करते हैं।

काल भैरव जयंती कब है?

काल भैरव जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाई जाती है, जो प्रायः नवंबर या दिसंबर में आती है। हर साल की सही तिथि और अष्टमी का समय अपने शहर के पंचांग से देखें।

काल भैरव का मंत्र क्या है?

सबसे सरल और प्रचलित मंत्र 'ॐ कालभैरवाय नमः' है। आदि शंकराचार्य की परंपरा का 'कालभैरवाष्टकम्' भी बहुत प्रसिद्ध है, जिसकी हर पंक्ति 'काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे' पर समाप्त होती है।

काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं?

शिव पुराण की कथा के अनुसार ब्रह्मा का सिर काटने के बाद ब्रह्महत्या का पाप भैरव के पीछे लगा रहा और काशी पहुँचने पर ही छूटा। तब शिव ने उन्हें काशी का रक्षक नियुक्त किया। मान्यता है कि काशी में रहने या आने वाले को पहले काल भैरव की अनुमति लेनी होती है।

काल भैरव को क्या चढ़ाया जाता है?

सरसों के तेल का दीपक, काले तिल, उड़द, नारियल, नीले या काले फूल और इमरती या जलेबी का भोग प्रचलित है। काले कुत्ते को रोटी खिलाना भी भैरव पूजा का अंग माना जाता है। उज्जैन के मंदिर में मदिरा का भोग मंदिर की विशेष परंपरा है, जो हर जगह नहीं होती।

क्या घर पर काल भैरव की पूजा कर सकते हैं?

हाँ, सरल भक्ति-भाव से नाम-जप, दीपक और कालभैरवाष्टक का पाठ घर पर किया जा सकता है। तांत्रिक विधि की उग्र पूजा केवल योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए।

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