देवी-देवता · महाभारत
द्रौपदी की कहानी: जन्म, पाँच पति, चीरहरण और अंत
अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
द्रौपदी पांचाल के राजा द्रुपद की पुत्री थीं, जिनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था। स्वयंवर में अर्जुन ने उन्हें जीता, पर माता कुंती के एक वचन और पूर्वजन्म के वरदान के कारण उनका विवाह पाँचों पांडवों से हुआ। द्यूत सभा में दुःशासन ने उनका अपमान किया और वस्त्र खींचे, जिस अन्याय ने आगे चलकर महाभारत युद्ध की नींव रखी।
द्रौपदी: एक नज़र में
| पिता | पांचाल नरेश द्रुपद |
|---|---|
| जन्म | यज्ञ की वेदी (अग्नि) से, भाई धृष्टद्युम्न के साथ |
| अन्य नाम | याज्ञसेनी, पांचाली, कृष्णा, द्रुपदकन्या |
| पति | युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव |
| पुत्र | पाँच उपपांडव (प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक, श्रुतसेन) |
| सखा | श्रीकृष्ण |
| पूजा | तमिलनाडु के द्रौपदी अम्मन मंदिरों में देवी रूप में |
कथाओं और पूजा-विधि के रूप क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं; अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।
महाभारत की कथा जिस एक स्त्री के इर्द-गिर्द घूमती है, वह है द्रौपदी। वे अग्नि से जन्मी, पाँच पराक्रमी पतियों की पत्नी बनीं, भरी सभा में अपमानित हुईं, और फिर भी उन्होंने अन्याय के सामने चुप रहने से इनकार किया। उनका प्रश्न — “क्या जो स्वयं को हार चुका है, वह अपनी पत्नी को दाँव पर लगा सकता है?” — आज भी धर्म और न्याय पर सबसे तीखे प्रश्नों में गिना जाता है।
अग्नि से जन्म
पांचाल के राजा द्रुपद को द्रोणाचार्य ने अर्जुन के हाथों पराजित करवाकर उनका आधा राज्य ले लिया था। अपमानित द्रुपद ने ऐसी संतान के लिए यज्ञ कराया जो द्रोण का वध कर सके। यज्ञ की अग्नि से पहले कवच-धारी धृष्टद्युम्न प्रकट हुए, और फिर वेदी से एक अत्यंत सुंदर श्यामवर्णा कन्या। आकाशवाणी हुई कि यह कन्या क्षत्रियों के विनाश का कारण बनेगी।
यज्ञ से जन्म के कारण वे याज्ञसेनी, पांचाल की राजकुमारी होने से पांचाली, और श्याम वर्ण के कारण कृष्णा कहलाईं।
स्वयंवर और पाँच पति
द्रुपद ने द्रौपदी के लिए कठिन स्वयंवर रखा — ऊपर घूमती मछली की आँख को नीचे जल में उसकी परछाईं देखकर बेधना। अनेक राजा धनुष तक नहीं चढ़ा सके। उस समय पांडव लाक्षागृह से बचकर ब्राह्मण-वेश में रह रहे थे। ब्राह्मण-वेशधारी अर्जुन ने लक्ष्य बेध दिया।
महाभारत के प्रचलित पाठ के अनुसार जब कर्ण धनुष उठाने आया, तो द्रौपदी ने कहा कि वे सूतपुत्र का वरण नहीं करेंगी। आलोचनात्मक संस्करण में यह प्रसंग नहीं है, इसलिए विद्वान इस पर एकमत नहीं।
अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर कुटिया पहुँचे और बाहर से कहा, “माँ, देखो हम क्या भिक्षा लाए हैं।” कुंती ने बिना देखे कह दिया, “जो लाए हो, पाँचों भाई मिलकर बाँट लो।” माता का वचन झूठा न हो, इसलिए समस्या खड़ी हुई। तब व्यास जी ने द्रुपद को बताया कि पूर्वजन्म में इस कन्या ने शिव से पति माँगते हुए पाँच बार “पति दो” कहा था, इसलिए शिव ने उसे पाँच पति का वर दिया। इस प्रकार द्रौपदी का विवाह पाँचों पांडवों से हुआ।
द्यूत सभा और चीरहरण
इंद्रप्रस्थ के वैभव से ईर्ष्या करके दुर्योधन ने मामा शकुनि के साथ मिलकर युधिष्ठिर को जुए (द्यूत) के लिए बुलाया। युधिष्ठिर अपना राज्य, धन, अपने भाई और फिर स्वयं को भी हार गए। अंत में उन्होंने द्रौपदी को दाँव पर लगाया और हार गए।
दुःशासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर सभा में घसीट लाया। द्रौपदी ने भीष्म, द्रोण और पूरी सभा से प्रश्न किया — जो पहले स्वयं को हार चुका, उसे मुझे दाँव पर लगाने का अधिकार कैसे था? सभा चुप रही; केवल दुर्योधन के भाई विकर्ण ने उनके पक्ष में बोला। तब दुर्योधन के कहने पर दुःशासन उनके वस्त्र खींचने लगा।
प्रचलित कथा में द्रौपदी ने दोनों हाथ उठाकर श्रीकृष्ण को पुकारा:
गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय। कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव॥
अर्थ: हे गोविंद, हे द्वारकावासी, हे गोपियों के प्रिय कृष्ण! कौरवों से अपमानित मुझे क्या आप नहीं जानते, हे केशव?
और साड़ी अनंत होती चली गई; दुःशासन थककर गिर पड़ा।
ग्रंथ के पाठों में अंतर: यह श्लोक महाभारत के प्रचलित (वल्गेट) पाठ में है। भंडारकर संस्थान के आलोचनात्मक संस्करण में द्रौपदी की यह प्रार्थना नहीं है; वहाँ केवल इतना है कि हर खींचे गए वस्त्र के नीचे वैसा ही दूसरा वस्त्र प्रकट होता रहा। भक्ति-परंपरा इसे सदा कृष्ण की कृपा मानती आई है।
इसी सभा में भीम ने प्रतिज्ञा की कि वे दुःशासन की छाती चीरकर उसका रक्त पिएँगे और दुर्योधन की जाँघ तोड़ेंगे। “द्रौपदी ने दुःशासन के रक्त से बाल धोने तक केश खुले रखने की प्रतिज्ञा की” — यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है, पर मुख्यतः बाद के नाटकों (जैसे वेणीसंहार) और लोक-कथाओं से आता है।
वनवास और अज्ञातवास
बारह वर्ष के वनवास में द्रौपदी पांडवों के साथ रहीं। प्रसिद्ध कथा है कि सूर्य से मिले अक्षय पात्र से रोज़ सबका भोजन होता था, पर द्रौपदी के भोजन कर लेने के बाद उसमें कुछ नहीं बचता था। एक दिन दुर्वासा ऋषि शिष्यों सहित भोजन माँगने आए; द्रौपदी ने कृष्ण को याद किया, कृष्ण ने पात्र में बचा एक पत्ता खाया और सब ऋषियों का पेट भर गया।
अज्ञातवास के वर्ष में द्रौपदी सैरंध्री बनकर विराट की रानी की सेविका रहीं। वहाँ सेनापति कीचक ने उनका अपमान करना चाहा, तो भीम ने कीचक का वध किया।
युद्ध के बाद का दुख
युद्ध में पांडव जीते, पर उसकी क़ीमत द्रौपदी ने चुकाई। युद्ध की अंतिम रात अश्वत्थामा ने सोते हुए उनके पाँचों पुत्रों (उपपांडवों) और भाई धृष्टद्युम्न को मार डाला। द्रौपदी के आग्रह पर पांडवों ने अश्वत्थामा को पकड़ा और उसके माथे की मणि लेकर उसे छोड़ा।
महाप्रस्थान
वर्षों बाद पांडव और द्रौपदी राज्य परीक्षित को सौंपकर हिमालय की ओर निकले। रास्ते में सबसे पहले द्रौपदी गिरीं। भीम ने पूछा कि इतनी धर्मपरायण स्त्री क्यों गिरी, तो युधिष्ठिर ने कहा — “वह हम सबमें अर्जुन से अधिक प्रेम करती थी।”
द्रौपदी की पूजा
तमिलनाडु, पुदुचेरी और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में द्रौपदी अम्मन के अनेक मंदिर हैं, जहाँ उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। इन मंदिरों के वार्षिक उत्सव में महाभारत का पाठ और तीमिति (अग्नि पर नंगे पैर चलना) की परंपरा प्रसिद्ध है। उत्सव की तिथियाँ और नियम मंदिर के अनुसार होते हैं, इसलिए मंदिर प्रबंधन से पुष्टि करें।
द्रौपदी और कृष्ण का संबंध सखा-भाव का था। लोक-कथा है कि कृष्ण की उँगली कटने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर बाँधी थी, और चीरहरण में कृष्ण ने उसी धागे का ऋण चुकाया — कई लोग इसे भाई दूज और रक्षाबंधन जैसे भाई-बहन के पर्वों से भी जोड़ते हैं। यह लोक-कथा है, व्यास महाभारत का प्रसंग नहीं।
द्रौपदी से क्या सीखें
द्रौपदी हमें बताती हैं कि अन्याय के सामने प्रश्न पूछना धर्म है, चाहे सामने कितने ही बड़े लोग चुप क्यों न बैठे हों। कृष्ण-भक्ति के लिए कृष्ण मंत्र देखें।
अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए Draupadi (English) देखें। महाभारत के अन्य पात्रों के लिए देवी-देवता अनुभाग देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
द्रौपदी का जन्म कैसे हुआ?
राजा द्रुपद ने द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए पुत्र-प्राप्ति का यज्ञ कराया। यज्ञ की अग्नि से पहले धृष्टद्युम्न प्रकट हुए और फिर वेदी से एक श्यामवर्णा कन्या — द्रौपदी। इसीलिए उन्हें याज्ञसेनी और श्याम रंग के कारण कृष्णा कहा जाता है।
द्रौपदी के पाँच पति क्यों थे?
महाभारत में दो कारण बताए गए हैं। अर्जुन जब स्वयंवर जीतकर द्रौपदी को घर लाए, तो कुंती ने बिना देखे कह दिया कि जो लाए हो, पाँचों भाई बाँट लो। साथ ही व्यास जी ने बताया कि पूर्वजन्म में द्रौपदी ने शिव से पाँच बार योग्य पति माँगा था, इसलिए इस जन्म में उसे पाँच पति मिले।
चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज किसने बचाई?
लोक-परंपरा और महाभारत के प्रचलित पाठ में द्रौपदी श्रीकृष्ण को पुकारती हैं और उनकी कृपा से साड़ी अनंत हो जाती है। आलोचनात्मक संस्करण में द्रौपदी की यह प्रार्थना नहीं है, केवल यह लिखा है कि वस्त्र खींचे जाने पर उसी तरह का दूसरा वस्त्र प्रकट होता रहा। भक्ति-परंपरा इसे कृष्ण की कृपा मानती है।
क्या द्रौपदी ने दुर्योधन से कहा था 'अंधे का पुत्र अंधा'?
यह बात बहुत प्रसिद्ध है, पर व्यास महाभारत में द्रौपदी के मुख से ऐसा वाक्य नहीं मिलता। मय सभा में दुर्योधन के गिरने पर हँसने का उल्लेख है (कुछ पाठों में भीम और अन्य का), पर 'अंधे का पुत्र अंधा' वाला संवाद बाद की कथाओं, नाटकों और टीवी धारावाहिकों से लोकप्रिय हुआ।
द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई?
युद्ध के बहुत वर्षों बाद पांडव और द्रौपदी राज्य त्यागकर हिमालय की ओर महाप्रस्थान पर निकले। रास्ते में सबसे पहले द्रौपदी गिरीं। भीम के पूछने पर युधिष्ठिर ने कहा कि वे पाँचों में अर्जुन से अधिक प्रेम करती थीं, यही उनका दोष था।
द्रौपदी की पूजा कहाँ होती है?
तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों में द्रौपदी अम्मन के अनेक मंदिर हैं, जहाँ उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। वहाँ के उत्सवों में अग्नि पर चलने की 'तीमिति' परंपरा प्रसिद्ध है।