देवी-देवता · शीश के दानी

खाटू श्याम जी की कहानी: बर्बरीक, मंदिर और दर्शन

अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026

खाटू श्याम जी महाभारत के वीर बर्बरीक हैं — घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र। युद्ध से पहले उन्होंने श्रीकृष्ण के माँगने पर अपना शीश दान कर दिया था। प्रसन्न होकर कृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में वे कृष्ण के ही नाम 'श्याम' से पूजे जाएँगे। उनका शीश राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू गाँव के मंदिर में विराजमान है, इसलिए वे 'खाटू श्याम' कहलाते हैं।

खाटू श्याम जी: एक नज़र में

मूल नामबर्बरीक
अन्य नामश्याम बाबा, शीश के दानी, तीन बाण धारी, हारे का सहारा, लखदातार
माता-पिताघटोत्कच और मौरवी (कुछ कथाओं में अहिलावती या कामकंटकटा)
दादाभीमसेन (दूसरे पांडव)
प्रमुख मंदिरखाटू, ज़िला सीकर, राजस्थान
प्रमुख पर्वफाल्गुन लक्खी मेला; देव उठनी एकादशी (जन्मोत्सव); हर एकादशी
कथा का स्रोतस्कंद पुराण और लोक परंपरा; व्यास महाभारत के मूल पाठ में यह प्रसंग नहीं मिलता

कथाओं और पूजा-विधि के रूप क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं; अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।

राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर भारत में आज शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला हो जहाँ “जय श्री श्याम” का जयकारा न गूँजता हो। श्याम बाबा के भक्त उन्हें प्रेम से लखदातार, शीश के दानी और हारे का सहारा कहते हैं। पर इस लोकप्रियता के पीछे एक अद्भुत त्याग की कथा है — एक ऐसे योद्धा की, जो अकेले पूरा महाभारत युद्ध जीत सकता था, पर जिसने युद्ध शुरू होने से पहले ही अपना सिर दान कर दिया।

बर्बरीक कौन थे?

बर्बरीक भीमसेन और हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच के बेटे थे। उनकी माता का नाम ज़्यादातर कथाओं में मौरवी मिलता है। बचपन से ही वे असाधारण योद्धा थे। तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें तीन अचूक बाण दिए — कई कथाओं में यह वरदान शिव जी से मिला, तो कुछ में देवियों से।

इन तीन बाणों की शक्ति ऐसी थी:

  • पहला बाण उन सबको चिह्नित कर देता जिन्हें नष्ट करना हो,
  • दूसरा बाण उन सबको चिह्नित करता जिन्हें बचाना हो,
  • और तीसरा बाण चिह्नित किए गए सबको नष्ट कर देता।

इसीलिए उन्हें तीन बाण धारी कहा जाता है। उनका वाहन नीला घोड़ा माना जाता है।

माँ को दिया वचन

जब कुरुक्षेत्र के युद्ध की घोषणा हुई, तो बर्बरीक भी युद्ध देखने और लड़ने के लिए निकले। जाते समय माता ने उनसे वचन लिया कि वे हमेशा हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे। बर्बरीक ने सहर्ष वचन दे दिया।

श्रीकृष्ण की परीक्षा

रास्ते में श्रीकृष्ण ब्राह्मण के वेश में उनसे मिले और पूछा कि वे युद्ध कितने समय में समाप्त कर सकते हैं। बर्बरीक ने उत्तर दिया — “केवल एक बाण से।” कृष्ण ने परीक्षा के लिए कहा कि पास के पीपल के पेड़ के सारे पत्तों को एक बाण से बींधकर दिखाओ। कृष्ण ने चुपके से एक पत्ता अपने पैर के नीचे दबा लिया। बर्बरीक का बाण सब पत्तों को बींधकर कृष्ण के पैर के चारों ओर घूमने लगा। बर्बरीक ने कहा, “ब्राह्मण देव, पैर हटा लीजिए, नहीं तो बाण आपके पैर को भी बींध देगा।”

शीश का दान

कृष्ण समझ गए कि बर्बरीक का वचन ही सबसे बड़ा संकट है। वे जिस पक्ष में जाएँगे वह भारी हो जाएगा, फिर वचन के कारण उन्हें दूसरी ओर जाना पड़ेगा — और यह क्रम तब तक चलेगा जब तक दोनों ओर कोई न बचे। तब ब्राह्मण-वेशधारी कृष्ण ने बर्बरीक से दान माँगा। बर्बरीक के वचन देने पर उन्होंने उनका शीश माँग लिया।

बर्बरीक समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हैं। उन्होंने वास्तविक रूप दिखाने की प्रार्थना की, और कृष्ण ने अपना स्वरूप प्रकट किया। बर्बरीक ने प्रसन्न मन से शीश दान कर दिया और केवल एक इच्छा रखी — कि वे पूरा युद्ध अपनी आँखों से देख सकें। कृष्ण ने उनका शीश युद्धभूमि के पास एक ऊँची पहाड़ी पर स्थापित कर दिया।

युद्ध के बाद जब पांडवों में बहस हुई कि विजय का श्रेय किसे है, तो कृष्ण ने कहा कि बर्बरीक से पूछो, उन्होंने सब देखा है। बर्बरीक ने कहा, “मैंने तो पूरे युद्ध में केवल श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र चलते देखा। जीत उन्हीं की है।”

कृष्ण ने प्रसन्न होकर वरदान दिया — “कलियुग में तुम मेरे नाम श्याम से पूजे जाओगे और जो सच्चे मन से तुम्हें पुकारेगा, उसकी पुकार तुम सुनोगे।”

कथा के रूप अलग-अलग हैं: व्यास महाभारत के मूल पाठ में बर्बरीक का यह प्रसंग नहीं है; यह कथा स्कंद पुराण और लोक परंपरा से आती है। कहीं शीश सुदर्शन चक्र से कटता है, कहीं बर्बरीक स्वयं अर्पित करते हैं। यहाँ उत्तर भारत में सबसे प्रचलित रूप दिया गया है।

महाभारत के युद्ध की पूरी कहानी के लिए कर्ण की कथा भी पढ़ें — एक और महादानी योद्धा।

खाटू श्याम मंदिर का इतिहास

मंदिर की परंपरा के अनुसार बर्बरीक का शीश खाटू की धरती में सदियों तक दबा रहा। एक दिन एक गाय उस स्थान पर अपने आप दूध बहाने लगी। खुदाई करने पर वहाँ शीश मिला। तत्कालीन शासक रूप सिंह चौहान को स्वप्न में मंदिर बनाने का आदेश हुआ और शीश को मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया। मंदिर की परंपरा इसे लगभग 1027 ई. का मानती है, जबकि आज की इमारत मुख्यतः 1720 ई. के पुनर्निर्माण की है।

खाटू में दर्शन के प्रमुख स्थान:

  • मुख्य मंदिर, जहाँ श्याम बाबा का शीश चाँदी के मुकुट और फूलों के श्रृंगार में विराजता है।
  • श्याम कुंड, जहाँ शीश प्रकट हुआ माना जाता है। भक्त दर्शन से पहले यहाँ स्नान करते हैं।
  • श्याम बगीची, जिसके फूल बाबा को चढ़ाए जाते हैं।
  • पास का गौरीशंकर मंदिर।

दर्शन से पहले ध्यान रखें

  • खाटू सीकर ज़िले में है; अधिकतर भक्त जयपुर की ओर से सड़क मार्ग से आते हैं और सबसे पास का रेलवे स्टेशन रींगस है।
  • दर्शन का समय मौसम, भोग और श्रृंगार के अनुसार बदलता है, और मेले के दिनों में विशेष व्यवस्था होती है — मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि करें।
  • फाल्गुन मेले और हर एकादशी पर बहुत भीड़ रहती है; बुज़ुर्गों और बच्चों के साथ जा रहे हों तो सामान्य दिनों में जाएँ।
  • बहुत से भक्त रींगस से खाटू तक निशान (ध्वजा) लेकर पैदल यात्रा करते हैं।

खाटू श्याम के प्रमुख त्योहार

  • फाल्गुन लक्खी मेला: फाल्गुन शुक्ल पक्ष में लगने वाला सबसे बड़ा मेला, जिसका मुख्य दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी और द्वादशी है। लाखों भक्त रंग-बिरंगे निशान लेकर पहुँचते हैं।
  • जन्मोत्सव: कार्तिक शुक्ल एकादशी, यानी देव उठनी एकादशी।
  • हर एकादशी, विशेषकर शुक्ल पक्ष की — एकादशी व्रत कथा भी पढ़ें।
  • होली, क्योंकि फाल्गुन मेला होली के पास ही पड़ता है।

श्याम बाबा के मंत्र और जयकारे

जय श्री श्याम

ॐ श्री श्याम देवाय नमः

ये भक्ति-परंपरा के नाम-जप हैं; इन्हें 108 बार माला पर या भजन के साथ बोला जाता है। चूँकि श्याम बाबा को श्रीकृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है, इसलिए भक्त कृष्ण मंत्र और हरे कृष्ण महामंत्र का जप भी करते हैं। घर पर पूजा में घी का दीपक, गुलाब के फूल, चूरमा या खीर का भोग और श्याम भजन प्रमुख हैं।

बर्बरीक की कथा क्या सिखाती है

बर्बरीक के पास असीम शक्ति थी और इरादा भी नेक था — कमज़ोर की मदद करना। पर कृष्ण ने दिखाया कि बिना विवेक के शक्ति और अच्छा इरादा भी विनाश ला सकता है। बर्बरीक की महानता इसमें थी कि उन्होंने यह बात समझी और अपना सब कुछ — युद्ध में अपनी भूमिका और अपना जीवन तक — समर्पित कर दिया। इसी समर्पण के कारण हर हारा हुआ मन उन्हें अपना सहारा मानता है।

अंग्रेज़ी में यही विषय पढ़ने के लिए Khatu Shyam Ji (English) देखें। अन्य देवी-देवताओं के लिए देवी-देवता अनुभाग और जप के लिए हिंदी मंत्र संग्रह देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खाटू श्याम जी कौन हैं?

खाटू श्याम जी बर्बरीक हैं, जो घटोत्कच और मौरवी के पुत्र तथा भीम के पौत्र थे। उन्होंने महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण को अपना शीश दान कर दिया। कृष्ण के वरदान से कलियुग में वे 'श्याम' नाम से पूजे जाते हैं।

खाटू श्याम को 'हारे का सहारा' क्यों कहते हैं?

बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया था कि युद्ध में वे हमेशा हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे। इसी वचन के कारण भक्त मानते हैं कि जो जीवन में हार गया हो या निराश हो, श्याम बाबा उसका सहारा बनते हैं।

खाटू श्याम मंदिर कहाँ है?

मुख्य मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू गाँव में है। यहाँ सड़क मार्ग से जयपुर की ओर से पहुँचा जाता है और सबसे पास का रेलवे स्टेशन रींगस जंक्शन है। दर्शन का समय त्योहारों और मौसम के अनुसार बदलता है, इसलिए मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट या मंदिर समिति की सूचना से पुष्टि करें।

खाटू श्याम जी का जन्मदिन कब मनाया जाता है?

श्याम बाबा का जन्मोत्सव कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव उठनी एकादशी को मनाया जाता है। 2026 में देव उठनी एकादशी 20 नवंबर को है। सबसे बड़ा मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष में लगता है, जिसका मुख्य दिन फाल्गुन शुक्ल एकादशी है।

खाटू श्याम जी का मंत्र क्या है?

भक्त सबसे अधिक 'जय श्री श्याम' का जयकारा और 'ॐ श्री श्याम देवाय नमः' का जप करते हैं। ये भक्ति-परंपरा के नाम-जप हैं, किसी प्राचीन ग्रंथ के बीज मंत्र नहीं। श्याम बाबा को कृष्ण का ही रूप मानने के कारण कृष्ण मंत्र का जप भी किया जाता है।

क्या बर्बरीक की कथा महाभारत में है?

व्यास महाभारत के मूल (आलोचनात्मक) पाठ में बर्बरीक के शीश दान की कथा नहीं मिलती। यह कथा स्कंद पुराण के माहेश्वर खंड (कौमारिका खंड) और राजस्थान-हरियाणा की लोक परंपरा में मिलती है, और अलग-अलग जगह इसके रूप थोड़े अलग हैं।

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