देवी-देवता · मंगलवार और शनिवार

संकटमोचन हनुमान अष्टक: पूरा पाठ, अर्थ और लाभ

अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026

संकटमोचन हनुमान अष्टक गोस्वामी तुलसीदास जी की परंपरा से जुड़ा अवधी भाषा का आठ छंदों का स्तोत्र है। हर छंद रामायण के उस संकट की याद दिलाता है जिसे हनुमान जी ने दूर किया, और हर छंद इसी पंक्ति पर समाप्त होता है — 'को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।' इसका पाठ मंगलवार, शनिवार और किसी भी कठिन समय में किया जाता है।

संकटमोचन हनुमान अष्टक: एक नज़र में

पूरा नामसंकटमोचन हनुमानाष्टक
रचयितापरंपरा से गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी)
भाषाअवधी
संरचना8 छंद (सवैया) और अंत में 1 दोहा
पाठ के दिनमंगलवार, शनिवार, हनुमान जयंती, संकट के समय
साथ में पढ़ेंहनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान आरती

कथाओं और पूजा-विधि के रूप क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं; अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।

जब हनुमान चालीसा के बाद भी मन किसी बड़ी चिंता से भारी हो, तो बहुत से घरों में संकटमोचन हनुमान अष्टक पढ़ा जाता है। अष्टक का अर्थ है आठ छंदों का स्तोत्र। इसकी ख़ास बात यह है कि यह हनुमान जी से सीधे बात करता है — “आपने सबके संकट हरे, तो मेरा संकट कौन-सा इतना बड़ा है जो आपसे न टले?”

संकटमोचन हनुमान अष्टक — पूरा पाठ

अलग-अलग पुस्तकों में कुछ शब्दों की वर्तनी (जैसे “लछिमन/लक्ष्मण”, “बिचार/विचार”) थोड़ी अलग मिलती है; अर्थ वही रहता है।

बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो॥ देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ १॥

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिय कौन बिचार बिचारो॥ कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ २॥

अंगद के सँग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाय इहाँ पगु धारो॥ हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया-सुधि प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ३॥

रावन त्रास दई सिय को सब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो॥ चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ४॥

बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्रान तजे सुत रावन मारो। लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥ आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ५॥

रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग की फाँस सबै सिर डारो। श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो॥ आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ६॥

बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो। देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥ जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत सँहारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ७॥

काज किए बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहिं जात है टारो॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ८॥

दोहा लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

हर छंद का सरल अर्थ

टेक (हर छंद की अंतिम पंक्ति): “हे कपिराज, संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम ही ‘संकटमोचन’ — संकट हरने वाला — है?” यह पंक्ति हर कथा को एक तर्क बना देती है: आपने उन सबको बचाया, तो मुझे भी बचाएँगे।

  1. सूर्य को निगलना: बचपन में आपने सूर्य को फल समझकर निगल लिया, जिससे तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। देवताओं की विनती पर आपने सूर्य को छोड़ दिया और संसार का कष्ट दूर किया।
  2. सुग्रीव का भय: बालि के डर से सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे, जहाँ मुनि (मतंग) के शाप के कारण बालि नहीं आ सकता था। आपने ब्राह्मण का रूप धरकर श्रीराम को सुग्रीव से मिलाया और उनका शोक दूर किया।
  3. सीता की खोज: अंगद के साथ सीता जी को खोजने गए वानरों को आदेश था कि बिना समाचार लौटे तो जीवित नहीं बचेंगे। समुद्र तट पर सब थककर निराश हो गए, तब आपने समुद्र लाँघकर सीता जी का समाचार लाया और सबके प्राण बचाए।
  4. अशोक वाटिका: रावण और राक्षसियाँ सीता जी को डरा रही थीं और दुख से वे अग्नि माँग रही थीं। उसी समय आपने प्रभु की मुद्रिका (अंगूठी) देकर उनका शोक दूर किया और बड़े-बड़े राक्षसों को मारा।
  5. लक्ष्मण की मूर्छा: रावण-पुत्र मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हुए, तब आप वैद्य सुषेण को उनके घर सहित ले आए, द्रोणगिरि पर्वत उखाड़ लाए और संजीवनी देकर लक्ष्मण के प्राण बचाए।
  6. नागपाश: युद्ध में रावण ने नागपाश से श्रीराम सहित पूरी सेना को बाँध दिया। आप गरुड़ जी को ले आए, जिन्होंने बंधन काट दिए।
  7. अहिरावण वध: अहिरावण राम-लक्ष्मण को पाताल ले गया और देवी को उनकी बलि देने का षड्यंत्र रचा। आपने वहाँ पहुँचकर अहिरावण को उसकी सेना सहित मार डाला।
  8. भक्त की प्रार्थना: आपने देवताओं के बड़े-बड़े काम किए हैं। मुझ ग़रीब का ऐसा कौन-सा संकट है जो आपसे न टले? हे महाप्रभु, जो भी संकट मेरा हो, उसे जल्दी हर लीजिए।

दोहा: आपकी देह लाल है, उस पर सिंदूर की लाली शोभा देती है और पूँछ भी लाल है। वज्र जैसी देह वाले, दानवों का नाश करने वाले वीर कपि की जय हो, जय हो, जय हो।

कथाओं का स्रोत: पहले छह छंदों के प्रसंग वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में मिलते हैं (कुछ विवरण, जैसे सुषेण को घर सहित लाना, बाद की परंपराओं से हैं)। सातवें छंद की अहिरावण कथा वाल्मीकि रामायण में नहीं, बल्कि बाद की क्षेत्रीय रामकथाओं में मिलती है।

हनुमान अष्टक पाठ की विधि

  1. स्नान करके हनुमान जी या श्रीराम के चित्र के सामने बैठें और घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ।
  2. लाल फूल, सिंदूर, या गुड़-चने का भोग अर्पित करें।
  3. पहले कुछ बार “श्री राम जय राम जय जय राम” बोलें — हनुमान जी सबसे पहले राम-भक्त हैं।
  4. संभव हो तो पहले हनुमान चालीसा पढ़ें, फिर अष्टक।
  5. हर छंद को धीरे-धीरे उसकी कथा याद करते हुए पढ़ें और टेक पर रुकें।
  6. आठवें छंद के बाद अपने शब्दों में अपना संकट हनुमान जी से कहें।
  7. दोहा पढ़कर आरती करें और प्रसाद बाँटें।

मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती

मंगलवार हनुमान जी का प्रमुख दिन है। शनिवार को पाठ इसलिए होता है क्योंकि लोक-मान्यता है कि हनुमान जी के भक्तों को शनि देव कष्ट नहीं देते। साल में हनुमान जयंती पर इसका विशेष पाठ होता है। अधिकतर उत्तर भारत में हनुमान जयंती चैत्र पूर्णिमा को मनाई जाती है, जबकि कुछ परंपराओं (जैसे अयोध्या) में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, यानी दिवाली से एक दिन पहले — इस साल की तिथियों के लिए दिवाली 2026 देखें। मंगलवार की पूजा के साथ यह पाठ प्रदोष व्रत जैसे शिव-व्रतों के दिन भी किया जा सकता है, क्योंकि परंपरा हनुमान जी को शिव का अंश (रुद्रावतार) मानती है।

हनुमान चालीसा, अष्टक और बजरंग बाण में अंतर

हनुमान चालीसा हनुमान अष्टक बजरंग बाण
लंबाई 40 चौपाइयाँ और दोहे 8 छंद और 1 दोहा लगभग 40 पंक्तियाँ
भाव गुणों और कार्यों की स्तुति संकटों की याद और सहायता की प्रार्थना तीव्र आह्वान
कब रोज़ मंगलवार, शनिवार, कठिन समय विशेष संकट में

अंग्रेज़ी में छंदों का अर्थ पढ़ने के लिए Hanuman Ashtak meaning (English) देखें। हनुमान जी के छोटे मंत्रों के लिए हनुमान बीज मंत्र और पूरा हिंदी मंत्र संग्रह उपलब्ध है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संकटमोचन हनुमान अष्टक किसने लिखा?

परंपरा से इसे गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना माना जाता है, जिन्होंने रामचरितमानस और हनुमान चालीसा भी लिखी। यह अवधी भाषा में सवैया छंद में है।

हनुमान अष्टक का पाठ कब करना चाहिए?

मंगलवार और शनिवार हनुमान जी के दिन माने जाते हैं, इसलिए इन दिनों सुबह या शाम पाठ करना सबसे प्रचलित है। हनुमान जयंती पर और किसी भी संकट या भय के समय भी इसका पाठ किया जाता है। कई भक्त रोज़ एक बार पढ़ते हैं।

हनुमान अष्टक कितनी बार पढ़ना चाहिए?

रोज़ एक बार पाठ पर्याप्त है। किसी विशेष संकल्प के लिए कई लोग मंगलवार को 11 बार या 21 बार पाठ करते हैं। संख्या से अधिक महत्व श्रद्धा और ध्यान से पढ़ने का है।

हनुमान अष्टक और हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?

हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयाँ हैं जो हनुमान जी के गुणों और कार्यों की स्तुति करती हैं। हनुमान अष्टक में 8 लंबे छंद हैं, हर छंद एक संकट की कथा है, और भक्त अंत में अपना संकट दूर करने की प्रार्थना करता है। दोनों तुलसीदास जी की परंपरा से अवधी में हैं।

हनुमान अष्टक पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों का अनुभव है कि इससे भय कम होता है, साहस और धैर्य बढ़ता है और मन को भरोसा मिलता है कि हर संकट का हल है। ये भक्ति और मन के स्तर के लाभ हैं; पाठ के साथ व्यावहारिक प्रयास, और ज़रूरत हो तो डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह, भी ज़रूरी है।

क्या महिलाएँ हनुमान अष्टक का पाठ कर सकती हैं?

हाँ। हनुमान अष्टक भक्ति का स्तोत्र है और कोई भी श्रद्धालु — स्त्री, पुरुष, बच्चे — इसका पाठ कर सकता है। कुछ परिवारों में हनुमान प्रतिमा को स्पर्श न करने जैसे नियम माने जाते हैं, पर पाठ पर कोई रोक नहीं है।

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