देवी-देवता · महाभारत

कर्ण की कहानी: जन्म, कवच-कुंडल, श्राप और मृत्यु

अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026

कर्ण कुंती के सबसे बड़े पुत्र थे, जिनका जन्म विवाह से पहले सूर्य देव के वरदान से हुआ। लोक-लाज के डर से कुंती ने उन्हें नदी में बहा दिया और सारथी अधिरथ व राधा ने उन्हें पाला, इसलिए वे 'राधेय' और 'सूतपुत्र' कहलाए। वे दुर्योधन के मित्र और अंग देश के राजा बने, अपने कवच-कुंडल तक दान कर दिए, और कुरुक्षेत्र युद्ध के सत्रहवें दिन अर्जुन के हाथों मारे गए।

कर्ण: एक नज़र में

माता-पिताकुंती और सूर्य देव
पालक माता-पितासारथी अधिरथ और राधा
अन्य नामराधेय, वसुषेण, अंगराज, सूतपुत्र, वैकर्तन, दानवीर कर्ण
गुरुद्रोणाचार्य, फिर परशुराम (ब्रह्मास्त्र की शिक्षा)
राज्यअंग देश (दुर्योधन ने दिया)
मुख्य अस्त्रविजय धनुष, इंद्र की दी हुई वासवी शक्ति
मृत्युयुद्ध का 17वाँ दिन, अर्जुन के बाण से

कथाओं और पूजा-विधि के रूप क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं; अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।

महाभारत में अगर किसी पात्र के लिए पढ़ने वाले के मन में सबसे ज़्यादा सहानुभूति जागती है, तो वह कर्ण है। जन्म से राजकुमार, पर पला एक सारथी के घर में; प्रतिभा अर्जुन के बराबर, पर हर जगह “सूतपुत्र” कहकर ठुकराया गया; और अंत में अपने ही छोटे भाई के हाथों मारा गया। कर्ण की कहानी वफ़ादारी, दान और भाग्य से संघर्ष की कहानी है।

कर्ण का जन्म

राजकुमारी कुंती ने बचपन में ऋषि दुर्वासा की बड़ी सेवा की थी। प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उन्हें एक मंत्र दिया, जिससे वे किसी भी देवता का आह्वान कर उनसे पुत्र प्राप्त कर सकती थीं। किशोर कुंती ने कौतूहल में मंत्र की परीक्षा ली और सूर्य देव का आह्वान कर दिया। सूर्य के वरदान से जो बालक जन्मा, उसके शरीर पर जन्म से ही कवच और कानों में कुंडल थे।

अविवाहित कुंती लोक-लाज से डर गईं और उन्होंने बालक को एक पेटी में रखकर नदी में बहा दिया। वह पेटी हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ को मिली। अधिरथ और उनकी पत्नी राधा संतानहीन थे; उन्होंने बालक को अपना लिया और नाम रखा वसुषेण। राधा के पुत्र होने के कारण वह राधेय कहलाया।

शिक्षा और परशुराम का श्राप

कर्ण धनुर्विद्या सीखना चाहता था, पर सारथी-पुत्र होने के कारण उसे राजकुमारों जैसा मान नहीं मिलता था। तब वह स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम के पास गया, जो केवल ब्राह्मणों को शिक्षा देते थे। परशुराम ने उसे ब्रह्मास्त्र तक सिखा दिया।

एक दिन परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। तभी एक कीड़ा कर्ण की जाँघ में घुसकर काटने लगा। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण चुपचाप दर्द सहता रहा और ख़ून बहता रहा। ख़ून से जागे परशुराम ने कहा — “इतना कष्ट कोई ब्राह्मण नहीं सह सकता, तुम क्षत्रिय हो।” छल से शिक्षा लेने पर उन्होंने श्राप दिया कि जिस समय तुम्हें ब्रह्मास्त्र की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी, उसी समय तुम उसका मंत्र भूल जाओगे।

इसी समय के आसपास एक और घटना हुई: अभ्यास करते हुए कर्ण के बाण से एक ब्राह्मण की गाय का बछड़ा मर गया। ब्राह्मण ने श्राप दिया कि युद्ध में तुम्हारे रथ का पहिया धरती में धँस जाएगा।

रंगभूमि और दुर्योधन की मित्रता

हस्तिनापुर में राजकुमारों के कौशल-प्रदर्शन (रंगभूमि) में अर्जुन ने सबको चकित कर दिया। तभी कर्ण आया और उसने अर्जुन के सारे करतब दोहराकर द्वंद्व युद्ध की चुनौती दी। कृपाचार्य ने उसका कुल पूछा — राजकुमार से केवल राजा ही लड़ सकता है। कर्ण चुप रह गया।

तब दुर्योधन उठा और उसने वहीं कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया। उस दिन से कर्ण ने जीवन भर दुर्योधन का साथ निभाने की ठान ली। यह मित्रता कर्ण के जीवन का सबसे बड़ा सहारा भी बनी और सबसे बड़ा बंधन भी।

द्रौपदी स्वयंवर और द्यूत सभा

महाभारत के प्रचलित पाठ में कथा है कि द्रौपदी के स्वयंवर में जब कर्ण धनुष उठाने आया, तो द्रौपदी ने कहा कि वह सूतपुत्र से विवाह नहीं करेगी। (भंडारकर संस्थान के आलोचनात्मक संस्करण में यह पंक्ति नहीं है, इसलिए विद्वान इस पर एकमत नहीं हैं।)

बाद में द्यूत सभा में कर्ण का व्यवहार उसके जीवन का सबसे काला अध्याय है — उसने द्रौपदी का अपमान किया और उसके वस्त्र खींचने की बात कही। कर्ण की कहानी पढ़ते समय यह याद रखना ज़रूरी है कि वह महान दानी और वीर था, पर निर्दोष नहीं।

कवच-कुंडल का दान

इंद्र जानते थे कि जब तक कर्ण के पास कवच-कुंडल हैं, उसे मारा नहीं जा सकता और उनके पुत्र अर्जुन का जीवन ख़तरे में है। सूर्य देव ने स्वप्न में कर्ण को चेताया कि इंद्र ब्राह्मण बनकर कवच-कुंडल माँगने आएँगे। फिर भी कर्ण ने कहा कि वह अपने दान के नियम से पीछे नहीं हटेगा।

अगले दिन सूर्य-पूजा के बाद इंद्र आए और कवच-कुंडल माँगे। कर्ण ने अपने शरीर से उन्हें काटकर दे दिया। इस दान से लज्जित इंद्र ने बदले में उसे वासवी शक्ति दी, जो एक बार किसी को भी मार सकती थी। इसी कारण कर्ण वैकर्तन (अपना कवच काटने वाला) भी कहलाया।

कुंती से भेंट: दो वचन

युद्ध से पहले कृष्ण ने कर्ण को बताया कि वह कुंती का पुत्र और पांडवों का बड़ा भाई है, और यदि वह पांडवों की ओर आ जाए तो राज्य उसी का होगा। कर्ण ने मना कर दिया — जिस मित्र ने उसे सम्मान दिया, उसे वह धोखा नहीं देगा।

फिर कुंती स्वयं आईं। कर्ण ने माँ को दो वचन दिए: वह अर्जुन के अलावा किसी पांडव को नहीं मारेगा, और इस तरह कुंती के पाँच पुत्र हमेशा रहेंगे — या तो अर्जुन, या कर्ण।

युद्ध और मृत्यु

भीष्म के सेनापति रहते कर्ण ने युद्ध नहीं किया, क्योंकि भीष्म ने उसका अपमान किया था। भीष्म के गिरने के बाद वह युद्ध में उतरा। चौदहवें दिन की रात घटोत्कच कौरव सेना का संहार कर रहा था, तब दुर्योधन के आग्रह पर कर्ण को अर्जुन के लिए बचाकर रखी वासवी शक्ति घटोत्कच पर चलानी पड़ी।

द्रोणाचार्य के बाद कर्ण सेनापति बना। सत्रहवें दिन अर्जुन से भीषण युद्ध हुआ। ब्राह्मण के श्राप से उसके रथ का पहिया धरती में धँस गया, और परशुराम के श्राप से वह ब्रह्मास्त्र का मंत्र भूल गया। जब वह पहिया निकाल रहा था, तब कृष्ण ने अर्जुन को अभिमन्यु के वध और द्रौपदी के अपमान की याद दिलाई, और अर्जुन के बाण से कर्ण मारे गए।

युद्ध के बाद कुंती ने पांडवों को सच बताया। युधिष्ठिर ने अपने बड़े भाई के लिए विलाप किया और उसका तर्पण किया। युद्ध के अठारह दिनों के बारे में अंग्रेज़ी में Mahabharata war पढ़ें।

कर्ण और सूर्य उपासना

कर्ण प्रतिदिन नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। बिहार के अंग क्षेत्र (भागलपुर-मुंगेर) में लोक-मान्यता है कि सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा कर्ण से जुड़ी है, और कई लोग छठ पूजा को भी कर्ण की कथा से जोड़ते हैं। यह लोक-आस्था है, महाभारत का कथन नहीं। सूर्य उपासना के लिए सूर्य मंत्र देखें:

ॐ सूर्याय नमः

कर्ण से क्या सीखें

कर्ण सिखाता है कि जन्म से नहीं, कर्म से मनुष्य की पहचान होती है; कि दिया हुआ वचन और किया हुआ उपकार निभाना चाहिए। पर उसका जीवन यह भी दिखाता है कि ग़लत पक्ष के प्रति अंधी वफ़ादारी अच्छे मनुष्य को भी अधर्म में खड़ा कर देती है। महाभारत के एक और अद्भुत त्यागी पात्र के लिए खाटू श्याम (बर्बरीक) की कथा पढ़ें।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए Karna in the Mahabharata (English) देखें। गीता के उपदेश के लिए हिंदी भगवद्गीता और अन्य पात्रों के लिए देवी-देवता अनुभाग देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्ण के असली माता-पिता कौन थे?

कर्ण की माता कुंती और पिता सूर्य देव थे। ऋषि दुर्वासा के दिए मंत्र की परीक्षा लेते हुए अविवाहित कुंती ने सूर्य का आह्वान किया और कर्ण का जन्म कवच-कुंडल के साथ हुआ।

कर्ण को कौन-कौन से श्राप मिले थे?

दो प्रमुख श्राप थे। गुरु परशुराम ने यह जानकर कि कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर शिक्षा ली, श्राप दिया कि सबसे ज़रूरी समय पर वह ब्रह्मास्त्र का मंत्र भूल जाएगा। एक ब्राह्मण ने अपनी गाय के बछड़े के मारे जाने पर श्राप दिया कि युद्ध में उसके रथ का पहिया धरती में धँस जाएगा।

कर्ण ने कवच-कुंडल किसे दान किए?

इंद्र देव ब्राह्मण का वेश धरकर आए और कर्ण से उसके जन्मजात कवच और कुंडल माँगे। सूर्य देव ने स्वप्न में चेतावनी दी थी, फिर भी कर्ण ने दान दे दिया। बदले में इंद्र ने उसे एक बार प्रयोग होने वाली अमोघ शक्ति दी।

कर्ण की मृत्यु कैसे हुई?

युद्ध के सत्रहवें दिन अर्जुन से लड़ते समय कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँस गया और वह ब्रह्मास्त्र का मंत्र भी भूल गया। पहिया निकालते समय श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने बाण चलाया और कर्ण वीरगति को प्राप्त हुए।

कर्ण को दानवीर क्यों कहते हैं?

कर्ण का नियम था कि सूर्य-पूजा के बाद जो भी उससे कुछ माँगे, वह मना नहीं करेगा। इसी नियम के कारण उसने जानते हुए भी अपने प्राण-रक्षक कवच-कुंडल इंद्र को दे दिए। मरते समय सोने का दाँत दान करने जैसी कथाएँ लोक-परंपरा की हैं।

क्या पांडवों को पता था कि कर्ण उनका भाई है?

युद्ध से पहले केवल कृष्ण और कुंती ने कर्ण को उसका सच बताया था। पांडवों को यह कर्ण की मृत्यु के बाद कुंती से पता चला। युधिष्ठिर बहुत दुखी हुए और महाभारत के अनुसार उन्होंने स्त्रियों को श्राप दिया कि वे कोई रहस्य छिपा नहीं पाएँगी।

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