व्रत कथा · हर गुरुवार

बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत कथा: पूजा विधि, नियम और उद्यापन

अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026

बृहस्पतिवार (गुरुवार) का व्रत देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु को समर्पित है। इसे पौष मास को छोड़कर किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से शुरू किया जाता है और प्रायः 16 गुरुवार रखकर उद्यापन किया जाता है। व्रत में पीले वस्त्र पहनकर केले के पेड़ और बृहस्पति देव की पूजा की जाती है, चने की दाल और गुड़ चढ़ाया जाता है, कथा सुनी जाती है और दिन में एक बार बिना नमक का पीला भोजन किया जाता है।

बृहस्पतिवार व्रत कथा: एक नज़र में

देवतादेवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु
कब से शुरू करेंकिसी भी महीने के शुक्ल पक्ष का पहला गुरुवार (पौष मास छोड़कर)
कितने व्रतप्रायः 16 गुरुवार, फिर उद्यापन; कुछ लोग 1, 3 या 5 वर्ष तक रखते हैं
मुख्य भोगचने की दाल, गुड़, मुनक्का, केला, पीली मिठाई
रंगपीला — वस्त्र, फूल, चंदन और भोजन
आरतीॐ जय बृहस्पति देवा, उसके बाद ॐ जय जगदीश हरे

व्रत की तिथि, प्रदोष काल और पूजा का समय शहर और परंपरा के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।

देवगुरु बृहस्पति ज्ञान, धर्म, संतान, विवाह और धन के कारक माने जाते हैं। जिनकी कुंडली में गुरु कमज़ोर हो, जिनके विवाह में देर हो रही हो या घर में बरकत न हो, उन्हें प्रायः बृहस्पतिवार का व्रत रखने की सलाह दी जाती है। इस व्रत में भगवान विष्णु की भी पूजा होती है, इसलिए इसे विष्णु व्रत भी कहा जाता है।

बृहस्पतिवार व्रत पूजा विधि

  1. सुबह: स्नान करके पीले वस्त्र पहनें। संभव हो तो स्नान के जल में चुटकी भर हल्दी मिलाएँ।
  2. संकल्प: पूजा स्थान पर विष्णु या बृहस्पति देव का चित्र रखें, हाथ में जल और पीले फूल लेकर बताएँ कि कितने गुरुवार व्रत रखेंगे।
  3. पूजन: भगवान को पीला चंदन, हल्दी लगे अक्षत, पीले फूल, चने की दाल, गुड़, मुनक्का और पीली मिठाई चढ़ाएँ। घी का दीपक जलाएँ।
  4. केले के पेड़ की पूजा: घर के पास केले का पेड़ हो तो उसकी जड़ में जल चढ़ाएँ, हल्दी, चने की दाल और गुड़ अर्पित करें, दीपक जलाएँ और परिक्रमा करें। पेड़ न हो तो गमले में लगे केले या केवल चित्र के सामने पूजा कर लें।
  5. कथा: बृहस्पतिवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  6. आरती: “ॐ जय बृहस्पति देवा” और फिर ॐ जय जगदीश हरे आरती करें।
  7. भोजन: दिन में एक बार, शाम को या दोपहर में, बिना नमक का पीला भोजन करें।

पूजा सामग्री

विष्णु या बृहस्पति देव का चित्र, पीला कपड़ा, हल्दी, पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल (गेंदा), चने की दाल, गुड़, मुनक्का, केले, बेसन के लड्डू या पीली मिठाई, घी का दीपक, धूप, जल का लोटा और तुलसी दल।

बृहस्पतिवार व्रत कथा

प्राचीन समय में एक प्रतापी और दानी राजा था। वह हर गुरुवार व्रत रखता, ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को दान देता और देवगुरु बृहस्पति की पूजा करता था। पर उसकी रानी को यह सब अच्छा नहीं लगता था। वह न व्रत करती, न किसी को दान देती, और राजा को भी दान करने से रोकती थी।

एक गुरुवार राजा शिकार पर गया हुआ था। तभी बृहस्पति देव एक साधु का वेश धरकर महल के द्वार पर भिक्षा माँगने आए। रानी ने कहा, “महाराज, मैं इस दान-पुण्य से तंग आ चुकी हूँ। आप कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे यह सारा धन नष्ट हो जाए और मैं चैन से रह सकूँ।”

साधु ने समझाया कि धन से तो दान-पुण्य और अच्छे काम होते हैं, पर रानी नहीं मानी। तब साधु ने कहा, “यदि तुम सचमुच यही चाहती हो, तो गुरुवार के दिन घर लीपना, सिर धोना, कपड़े धोना और राजा से हजामत करवाना। सात गुरुवार में तुम्हारा सारा धन चला जाएगा।” इतना कहकर साधु चले गए।

रानी ने वैसा ही किया। तीसरे गुरुवार तक ही राजमहल का वैभव समाप्त होने लगा। अनाज और धन ख़त्म हो गया, नौकर चले गए और परिवार भूखा रहने लगा। राजा दुखी होकर कमाने के लिए परदेश चला गया, जहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर बेचने लगा।

घर में रानी और उसकी दासी भूख से व्याकुल थीं। रानी ने दासी को अपनी धनी बहन के घर कुछ अनाज माँगने भेजा। उस दिन गुरुवार था और बहन व्रत की कथा सुन रही थी, इसलिए उसने दासी को कोई उत्तर नहीं दिया। दासी निराश होकर लौट आई। कथा पूरी होने पर बहन स्वयं रानी के घर आई और बोली कि मैं कथा के बीच न बोल सकती थी, न उठ सकती थी। रानी ने अपनी सारी दुर्दशा बताई। बहन ने कहा, “बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। तुम भी उनका व्रत करो।” उसने व्रत की विधि बताई — पीले वस्त्र, चने की दाल और गुड़ से केले की जड़ की पूजा, कथा और बिना नमक का पीला भोजन।

रानी और दासी ने अगले गुरुवार से श्रद्धा से व्रत शुरू किया। कहते हैं कि भगवान की कृपा से उन्हें घर में ही पूजा के लिए चने की दाल और गुड़ मिल गया और व्रत के बाद पीला भोजन भी। धीरे-धीरे घर में फिर से अन्न और धन आने लगा। पर इस बार रानी ने आलस और अभिमान छोड़ दिया था और दान-पुण्य करने लगी।

उधर परदेश में राजा को भी एक दिन साधु के वेश में बृहस्पति देव मिले। उन्होंने राजा को व्रत की विधि बताई। राजा ने लकड़ी बेचकर मिले पैसों से चने की दाल और गुड़ ख़रीदकर व्रत किया और कथा कही। उसके दिन भी फिरने लगे। अंत में बृहस्पति देव ने स्वप्न में राजा को बताया कि रानी ने अपनी भूल सुधार ली है, अब घर लौट जाओ। राजा घर लौटा तो देखा कि महल पहले जैसा समृद्ध हो गया है। उसके बाद राजा-रानी दोनों जीवन भर गुरुवार का व्रत करते रहे और प्रजा में भी इसका प्रचार किया।

कथा की सीख यह है कि धन का अहंकार और दान से घृणा घर की बरकत छीन लेते हैं, जबकि श्रद्धा, संयम और दान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं।

व्रत के नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • पीले वस्त्र पहनें और पीले फूल, पीला चंदन और पीली मिठाई चढ़ाएँ।
  • दिन में एक बार बिना नमक का सात्विक पीला भोजन करें।
  • गुरु, माता-पिता और शिक्षकों का आदर करें; पुस्तकें और चने की दाल दान करें।

क्या न करें

  • गुरुवार को सिर न धोएँ, बाल और नाखून न काटें और कपड़े न धोएँ (परंपरा के अनुसार)।
  • उस दिन केला न खाएँ, क्योंकि उसकी पूजा की जाती है।
  • तामसिक भोजन, मांस और मदिरा से दूर रहें।

बृहस्पतिवार व्रत का उद्यापन

संकल्प के गुरुवार पूरे होने पर अगले गुरुवार उद्यापन करें। विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा, हवन, कथा और आरती के बाद ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को चने की दाल, बेसन के लड्डू और पीले चावल का भोजन कराएँ। पीले वस्त्र, हल्दी, चने की दाल, गुड़, केले और धार्मिक पुस्तकें दान करें।

भगवान विष्णु के एक और लोकप्रिय व्रत के लिए सत्यनारायण व्रत कथा और एकादशी व्रत कथा पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बृहस्पतिवार का व्रत कब से शुरू करें?

किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से व्रत शुरू करें। परंपरा के अनुसार पौष मास में नया व्रत शुरू नहीं किया जाता। अनुराधा नक्षत्र वाला गुरुवार भी शुभ माना जाता है।

गुरुवार व्रत में क्या खाना चाहिए?

दिन में एक बार पीले रंग का सात्विक भोजन, जैसे चने की दाल, बेसन के लड्डू, पीले चावल, केसर वाला दूध या खिचड़ी, बिना नमक के लिया जाता है। केले की पूजा की जाती है, इसलिए उस दिन केला खाया नहीं जाता।

गुरुवार को बाल धोना और कपड़े धोना क्यों मना है?

लोक मान्यता और व्रत कथा के अनुसार गुरुवार को सिर धोना, बाल या नाखून काटना, कपड़े धोना और घर में पोंछा लगाना बृहस्पति को कमज़ोर करता है और घर की समृद्धि घटाता है। व्रत रखने वाले इन नियमों का पालन करते हैं।

गुरुवार व्रत में केले के पेड़ की पूजा क्यों होती है?

केले के पेड़ में भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का वास माना जाता है। इसलिए जड़ में जल, चने की दाल, गुड़ और हल्दी चढ़ाकर दीपक जलाया जाता है।

16 गुरुवार व्रत का उद्यापन कैसे करें?

सत्रहवें गुरुवार को पीले वस्त्र पहनकर विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा करें, हवन करें, कथा पढ़ें और ब्राह्मण या ज़रूरतमंदों को पीला भोजन कराएँ। चने की दाल, गुड़, हल्दी, पीले वस्त्र, केले और पुस्तकें दान करें।

क्या अविवाहित लड़कियाँ गुरुवार व्रत रख सकती हैं?

हाँ। बृहस्पति को विवाह और ज्ञान का कारक माना जाता है, इसलिए अविवाहित युवतियाँ अच्छे वर और शीघ्र विवाह की कामना से बड़ी संख्या में यह व्रत रखती हैं।

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