व्रत कथा · हर पक्ष की त्रयोदशी
प्रदोष व्रत कथा: पूजा विधि, प्रदोष काल, वार अनुसार फल और उद्यापन
अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026
प्रदोष व्रत भगवान शिव का व्रत है, जो हर महीने के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है, यानी महीने में दो बार। इसकी मुख्य पूजा सूर्यास्त के आसपास के प्रदोष काल में होती है, जब शिवलिंग का अभिषेक, बेलपत्र अर्पण, प्रदोष व्रत कथा और आरती की जाती है। जिस वार को त्रयोदशी पड़ती है, उसी के नाम से इसे सोम प्रदोष, भौम प्रदोष या शनि प्रदोष कहते हैं।
प्रदोष व्रत कथा: एक नज़र में
| देवता | भगवान शिव और माता पार्वती |
|---|---|
| तिथि | शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (महीने में दो बार) |
| पूजा का समय | प्रदोष काल — सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से 45 मिनट बाद तक |
| व्रत की संख्या | प्रायः 11 या 26 प्रदोष, फिर उद्यापन |
| मुख्य अर्पण | जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, सफ़ेद फूल, भस्म |
| आरती | ॐ जय शिव ओंकारा |
व्रत की तिथि, प्रदोष काल और पूजा का समय शहर और परंपरा के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले विष को पीकर जब शिव ने संसार की रक्षा की, तब देवताओं ने त्रयोदशी के प्रदोष काल में उनकी स्तुति की थी। तभी से इस समय शिव पूजा का विशेष महत्व है। प्रदोष व्रत को कष्ट, रोग, कर्ज़ और दोषों को दूर करने वाला व्रत माना जाता है।
प्रदोष व्रत पूजा विधि
- सुबह: स्नान करके व्रत का संकल्प लें और शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ। दिन भर फलाहार या उपवास रखें।
- शाम की तैयारी: सूर्यास्त से पहले दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर साफ़ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़कें और उत्तर-पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
- अभिषेक: प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें।
- अर्पण: चंदन, भस्म, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, आक और सफ़ेद फूल चढ़ाएँ। माता पार्वती को सुहाग सामग्री अर्पित करें।
- जप: “ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जप करें।
- कथा: नीचे दी गई प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें। जिस वार का प्रदोष हो, उस वार की अलग कथा भी कई परिवारों में पढ़ी जाती है।
- आरती: ॐ जय शिव ओंकारा आरती करें और प्रसाद बाँटें।
- व्रत खोलना: पूजा के बाद सात्विक भोजन या फलाहार से व्रत खोलें।
पूजा सामग्री
शिवलिंग, गंगाजल, कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफ़ेद फूल, चंदन, भस्म, अक्षत, कलावा, जनेऊ, धूप, घी का दीपक, कपूर, फल, मिठाई और पार्वती जी के लिए सुहाग सामग्री।
प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय में एक नगर में एक विधवा ब्राह्मणी रहती थी। पति के निधन के बाद उसका कोई सहारा नहीं था, इसलिए वह अपने छोटे पुत्र के साथ सुबह भिक्षा माँगने निकलती और शाम को लौटती। वह भगवान शिव की भक्त थी और नियम से प्रदोष का व्रत रखती थी।
एक दिन भिक्षा माँगकर लौटते हुए उसे नदी किनारे एक सुंदर बालक घायल और भूखा मिला। वह विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके राज्य पर आक्रमण करके उसके पिता को मार डाला था और राज्य छीन लिया था। उसकी माँ भी शोक में चल बसी थीं, और वह अनाथ होकर भटक रहा था। ब्राह्मणी को उस पर दया आई। वह उसे घर ले आई और अपने पुत्र की तरह पालने लगी।
कुछ समय बाद ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम गई। ऋषि ने राजकुमार की पूरी कहानी बताई और कहा कि प्रदोष व्रत करने से उसके सारे कष्ट दूर होंगे। ब्राह्मणी और दोनों बालक श्रद्धा से प्रदोष व्रत करने लगे।
एक दिन दोनों युवक वन में घूम रहे थे। वहाँ उन्होंने कुछ गंधर्व कन्याओं को खेलते देखा। ब्राह्मण पुत्र तो घर लौट आया, पर राजकुमार धर्मगुप्त वहीं रुक गया और अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या से उसकी बातचीत हुई। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। अंशुमती ने उसे अपने पिता से मिलने बुलाया।
अगले दिन जब धर्मगुप्त वहाँ पहुँचा, तो गंधर्वराज ने बताया कि भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया है कि अपनी पुत्री का विवाह इसी राजकुमार से करें। दोनों का विवाह हो गया। इसके बाद गंधर्व सेना की सहायता से धर्मगुप्त ने विदर्भ पर आक्रमण किया, शत्रुओं को पराजित किया और अपना राज्य वापस पा लिया। उसने ब्राह्मणी को राजमाता का सम्मान दिया और ब्राह्मण पुत्र को अपना प्रधान बनाया।
जब अंशुमती ने पूछा कि यह सब कैसे संभव हुआ, तो धर्मगुप्त ने बताया कि यह प्रदोष व्रत का फल है। तभी से मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से प्रदोष व्रत करता है और यह कथा सुनता है, उसके जीवन से दरिद्रता और संकट दूर होते हैं और भगवान शिव उसकी रक्षा करते हैं।
वार के अनुसार प्रदोष व्रत
| वार | नाम | पारंपरिक फल |
|---|---|---|
| रविवार | रवि प्रदोष | आरोग्य और लंबी आयु |
| सोमवार | सोम प्रदोष | मनोकामना पूर्ति, मानसिक शांति |
| मंगलवार | भौम प्रदोष | रोग और कर्ज़ से मुक्ति |
| बुधवार | बुध प्रदोष | बुद्धि और शिक्षा |
| गुरुवार | गुरु प्रदोष | शत्रु पर विजय, गुरु कृपा |
| शुक्रवार | शुक्र प्रदोष | सौभाग्य और दांपत्य सुख |
| शनिवार | शनि प्रदोष | संतान सुख, शनि दोष शांति |
व्रत के नियम
- पूजा प्रदोष काल में ही करें; यही इस व्रत की सबसे मुख्य बात है।
- दिन में सोने, क्रोध करने और तामसिक भोजन से बचें।
- शिवलिंग पर तुलसी, हल्दी और सिंदूर न चढ़ाएँ।
- पूजा के बाद किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान दें।
प्रदोष व्रत का उद्यापन
11 या 26 प्रदोष पूरे होने पर अगली त्रयोदशी को उद्यापन करें। उद्यापन से एक दिन पहले गणेश जी की पूजा और रात्रि जागरण की परंपरा है। उद्यापन के दिन मंडप बनाकर शिव-पार्वती की पूजा करें, “ॐ उमा सहित शिवाय नमः” मंत्र से 108 आहुतियाँ दें, कथा पढ़ें, आरती करें और ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा दें।
साप्ताहिक शिव व्रत के लिए सोमवार व्रत कथा पढ़ें। अंग्रेज़ी में Maha Shivratri puja guide भी उपलब्ध है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रदोष व्रत कब होता है?
प्रदोष व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को होता है। व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल में) त्रयोदशी तिथि हो। सटीक तारीख और प्रदोष काल का समय अपने शहर के पंचांग से देखें।
प्रदोष काल क्या है?
सूर्यास्त के आसपास का लगभग डेढ़ घंटे का समय प्रदोष काल कहलाता है। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं और सभी देवता उनकी स्तुति करते हैं, इसलिए यह शिव पूजा का सबसे शुभ समय है।
वार के अनुसार प्रदोष व्रत का क्या फल है?
परंपरा के अनुसार सोम प्रदोष मनोकामना पूर्ति और अच्छे स्वास्थ्य के लिए, भौम (मंगल) प्रदोष रोग और कर्ज़ से मुक्ति के लिए, बुध प्रदोष ज्ञान के लिए, गुरु प्रदोष शत्रु-भय दूर करने के लिए, शुक्र प्रदोष सौभाग्य के लिए, शनि प्रदोष संतान के लिए और रवि प्रदोष आरोग्य और आयु के लिए माना जाता है।
प्रदोष व्रत में क्या खाना चाहिए?
दिन में फलाहार, दूध, मखाना, साबूदाना आदि ले सकते हैं। प्रदोष काल की पूजा के बाद एक बार सात्विक भोजन या फलाहार किया जाता है। कई भक्त निर्जल व्रत भी रखते हैं; स्वास्थ्य के अनुसार निर्णय लें।
प्रदोष व्रत किस दिन से शुरू करें?
कोई भी प्रदोष शुरू करने के लिए उपयुक्त है, पर सोम प्रदोष या शनि प्रदोष से शुरू करना विशेष शुभ माना जाता है। संकल्प लें कि 11 या 26 प्रदोष व्रत करेंगे।
प्रदोष व्रत का उद्यापन कैसे करें?
संकल्प के व्रत पूरे होने पर अगली त्रयोदशी को उद्यापन करें। एक दिन पहले गणेश पूजा करें, उद्यापन के दिन शिव-पार्वती की पूजा, 'ॐ उमा सहित शिवाय नमः' मंत्र से हवन, कथा और आरती करें और ब्राह्मण या ज़रूरतमंदों को भोजन व दान दें।